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हमारा समाज भले ही मातृ देवो भव और पितृ देवो भव की माला जपता रहता है, लेकिन बुजुर्गो के हालात पर संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय समाज में बुजुर्गो को परिवार से मिलने वाले सम्मान में कमी आती जा रही है। अधिकतर भारतीय बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षित और एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं।
देश में बुजुर्गो की आबादी तेजी से बढ़ ही रही है। पिछले एक दशक में भारत में वयोवृद्ध लोगों की आबादी 40 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। आगे आनेवाले दशकों में इसके 45  प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। दुनिया के ज्यादातर देशों में बुजुर्गो की संख्या दोगुनी होने में सौ से ज्यादा वर्ष का समय लग गया, लेकिन भारत में सिर्फ 20 वर्षो में ही इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो गई। 

गौरतलब है कि आज आदमी की औसत आयु बढ़कर 70 साल से ज्यादा हो गई है। वर्तमान दौर में बढ़ती हुई महंगाई, परिवार द्वारा क्षमता से ज्यादा खर्च और कर्ज से गड़बड़ाते बजट का प्रभाव बुजुर्गो के जीवन पर भी पड़ रहा है। साथ ही हमारी आर्थिक और वित्तीय नीति भी बुजुर्गो को कोई सहारा नहीं दे पा रही है।

बुजुर्गो की देखभाल में वित्तीय बाधाएं अक्सर आड़े आती हैं। आम तरीके से एक सामान्य परिवार अपने कुल खर्च का लगभग 15 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल पर खर्च करता है। अगर परिवार में कोई बुजुर्ग सदस्य है तो यह खर्च डेढ़ से दो गुना हो जाता है। इस खर्च में एक बड़ा हिस्सा दवाओं पर खर्च का होता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत दुनिया में सस्ती जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, फिर भी यहां पर दवाओं पर खर्च अधिक है। 



सरकारों ने बुजुर्गो को पेंशन की सुविधा दी है, पर वह भी नाकाफी साबित हो रही है। केंद्र सरकार द्वारा वृद्धों के भरण-पोणण के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर वे फाइलों की धूल चाट रहे हैं। नतीजन लोग कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। सरकार को सख्ती से ऐसे कानून लागू करने चाहिए, ताकि वृद्धों को उनका हक मिल सके। जबतक बुजुर्गो को उनका सम्मान नहीं मिलेगा, तबतक रस्मी तौर पर हर साल वृद्ध दिवस मनाने की कोई सार्थकता नहीं होगी।  

प्रत्येक वर्ष 1 अक्टूबर को विश्व वृद्ध दिवस मनाया जाता है, मगर ऐसे आयोजन औपचारिकता भर रह गए हैं। बुजुर्ग किसी दूसरे द्वारा नहीं, बल्कि अपनों के कारण ही उपेक्षित हैं। शायद यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन बच्चों के लिए अपना पेट काटकर उनका पालन पोषण किया, आज वही  उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। 

यह भी देखने में आता है कि गरीब लोग तो माता-पिता और अपने बुजुर्गो की अच्छी सेवा करते हैं, मगर साधन संपन्न लोगों द्वारा आज बुजुर्गो को ओल्ड एज होम तथा सरकार द्वारा बनाए गए वृद्ध आश्रमों के हवाले कर दिया जा रहा है। कुछ बुजुर्ग तो घर में ही कैद होकर रह गए हैं। वे गुमनामी के अंधरे में जीने को मजबूर हैं।

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  • पाठ्यक्रम के बढ़े बोझ ने छीना बच्चों का बचपन
  • होमवर्क, प्रोजेक्ट तैयार करने में बीत रहा दिन
  • स्कूल के बाद भी बच्चा पढ़ाई में व्यस्त


सीआईएससीई (CISCE: Council for the Indian School Certificate Examinations) और सीबीएसई(CBSE: Central Board of Secondary Education) के स्कूलों में बच्चों पर लादे गए पाठ्यक्रम एवं होमवर्क के दबाव ने उनका शारीरिक विकास रोक दिया है। बड़ा पाठ्यक्रम और स्कूलों में मिलने वाले रोज-रोज के होमवर्क ने बच्चों का बचपन छीन लिया है। बच्चे स्कूल से घर आने के बाद भी हर समय होमवर्क, प्रोजेक्ट सहित अन्य गतिविधियों जुटे रहते हैं। खेलकूद जैसी गतिविधियों में भागीदारी के अभाव में बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। हालांकि इधर सीबीएसई ने भी बच्चों के होमवर्क तथा पाठ्यक्रम के बोझ को कम करने के लिए पहल की है।
सीआईएससीई एवं सीबीएसई के स्कूल बच्चों पर होमवर्क का बोझ अभिभावकों पर थोपकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रहे हैं।  जबकि पाठ्यक्रम वही सहज है जिसे बच्चा आसानी के साथ समझ सके। दो पेज की एक पाठ्य सामग्री बच्चों को कभी-कभी 10 बार रटने के बाद भी याद नहीं होती जबकि आठ पेज की एक पाठ्य सामग्री एक बार पढ़ने के बाद बड़ी आसानी के साथ बच्चे को याद हो जाती है।

आइये देखें कि आरटीई (RTE : Right to Education), एनसीएफ (NCF) की गाइड लाइन क्या कहती है-
  • आरटीई में होमवर्क नहीं देने की बात कही गई है
  • एनसीएफ 2005 में रटंत पद्घति से दूर रहने की बात
  • पाठ्क्रम ऐसा हो जो आसानी से याद हो जाए
  • बच्चों को उनके स्तर के पाठ्यक्रम को ही पढ़ने को लागू किया जाए



हाल ही में सीबीएसई की ओर से होमवर्क पर मांगे गए सुझाव
  • हर सप्ताह होमवर्क कितना दिया जाए?
  • होमवर्क किस प्रकार से पूरा किया जाए?
  • पूछा गया है कि क्या सभी विषयों के लिए होमवर्क हो?
  • क्या सभी बच्चों को बराबर होमवर्क दिया जाए?
  • क्या इंटरनेट को होमवर्क का हिस्सा बनाया जाए?

पाठ्यक्रम निर्धारण के समय बच्चों के स्तर को ध्यान में जरूर रखा जाए। आरटीई में यह स्पष्ट उल्लेख है कि बच्चों पर होमवर्क का बोझ किसी हालत में न थोपा जाए।  एनसीएफ 2005 में भी स्पष्ट उल्लेख है कि बच्चों को रटने की प्रवृत्ति से भी दूर रखा जाए। ऐसे में कोर्स ऐसा हो जिसे बच्चा आसानी के साथ अपने अंदर आत्मसात कर सके।

इधर एक प्रवृत्ति और बढ़ी है कि आईएससीई एवं सीबीएसई से जुड़े निजी स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबों से इतर दूसरी किताबें थोप दी गई हैं। इन किताबों में बच्चों के स्तर को ध्यान में दिए बगैर ऐसा पाठ्यक्रम लाद दिया है जो उन बच्चों के स्तर का नहीं है। बार-बार पढ़ाने के बाद भी बच्चा जो कोर्स पढ़ रहा है, उसकी अपने जीवन में उपयोगिता सिद्घ नहीं कर पाता है। ऐसे में इस प्रकार के पाठ्यक्रम थोपने से बचना होगा।

मानसिक दिक्कतों से अलग पढ़ाई के बोझ के कारण बच्चों का शारीरिक विकास भी नहीं हो पा रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चे की हड्डियों को इसी उम्र में बढ़त (Growth) मिलता है। शारीरिक मेहनत के अभाव में संभव नहीं है। बच्चे इंडोर गेम में अधिक भागीदारी करते हैं,  इस कारण से उन्हें सूरज की रोशनी नहीं मिल पाती है, ऐसे में उन्हें विटामिन डी भी नहीं मिल पाता है। इस कारण से शरीर का विकास ठप पड़ जता है। बच्चे के मानसिक विकास के लिए खेल जरूरी है।


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अगर आप ब्लॉगर हैं और ब्लॉग और वेबसाइट से पैसा कमाना चाहते हैं तो इंटरनेट पर कमाई के कई तरीके मौजूद है। इन तरीकों को अपनाकर आप आराम से कुछ रूपल्ली से हजारों रुपए तक की कमाई कर सकते हैं। लेकिन निःसन्देह विभिन्न देशों के ब्लॉगर के बीच कमाई को सबसे लोकप्रिय तरीका है गूगल एडसेंस। लेकिन अब तक गूगल द्वारा हिन्दी भाषा को एडसेंस पर समर्थन ना देने से हिन्दी पट्टी के ब्लॉगर अपने इंटरनेट का खर्च भी नहीं निकाल पा रहे थे जोकि लेखन के आगे के चरण में उदासीनता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ था।



सबसे खुशी की बात यह है कि अब हिन्दी भी गूगल एडसेंस की समर्थित भाषा में शामिल कर ली गई है। आज से गूगल की एडसेंस समर्थित भाषाओं में हिन्दी को भी देखा जा रहा है।  आप स्वयं यहाँ जाकर इसकी पुष्टि कर सकते हैं। मतलब कि अब हिन्दी ब्लॉगर भी अपनी रचनाधर्मिता के चलते अपने खर्चे निकाल सकेंगे, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

गूगल एडसेंस- अपने ब्लॉग पर गूगल एडसेंस का विज्ञापन लगाकर आप हर महीने हजारों कमा सकते हैं। गूगल एडसेंस का विज्ञापन टेक्स्ट, इमेज और वीडियो के रूप में होता है। इसके कोड को ब्लॉग पर डालने के बाद विज्ञापन दिखने लगता है। जब भी कोई पाठक आपके ब्लॉग पर डाले गए गूगल एडसेंस के विज्ञापन को क्लिक करेगा। उस क्लिक के बदले आपको पैसा मिलेगा. लेकिन आपको यह ध्यान रखना होगा कि खुद के कंप्यूटर, आईपी से विज्ञापन क्लिक ना हो। 

आपको अपने जिस हिन्दी ब्लॉग पर एडसेंस को चालू करना हो उस ब्लॉग को ब्लॉगर डैशबोर्ड पर जाकर खोलें।  उसके बाद बाएँ ओर दिख रहे Earning टैब पर क्लिक करके  क्लिक करें और एडसेंस को चालू करने का ऑप्शन स्वीकार कर लें। (चित्र देखें) उसके बाद दिखाये गए चित्रों के अनुसार लेआउट मे जाकर विभिन्न जगह add a gadget क्लिक   करके एडसेंस की यूनिट ब्लॉग पर लगा दें।


STEP - 1


STEP - 2

STEP - 3 

STEP -4
एक बात ध्यान रखें कि विज्ञापन का प्लेसिंग सही हो। विज्ञापन वहां लगाएं जहां लोगों की नजर जरूर जाए और लोग उसे क्लिक करने से खुद को रोक ना पाए। अगर आपके ब्लॉग में फोटो और वीडियो नहीं के बराबर है या कम है तो सिर्फ टेक्स्ट एड लगाना आपके लिए बेहतर होगा।

एक बात ध्यान रखिएगा कि Google Adsense जैसे साधन आपको क्लिक के हिसाब से भुगतान करते हैं. इसे PPC यानी Pay Per Click कहते है। जबकि कुछ साइट आपके ट्रैफिक के अनुसार आपको पैसा देते हैं। जितना ज्यादा हिट उतना ज्यादा भुगतान। इसे CPM कहते हैं यानी Cost Per Mille (Thousand)। इसलिए आपकी कोशिश ये होनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लोग आपके ब्लॉग पर आए।

इसके लिए आपको रोज पाठकों के लिए ऑरिजीनल पोस्ट लिखने होंगे। इससे लोगों को प्रतिदिन कुछ ना कुछ नया पढ़ने के लिए मिलेगा। जब नया मिलेगा तो वह रोज आएंगे और आपके ब्लॉग, साइट का ट्रैफिक, रैंकिंग बढ़ेगा. जितना ट्रैफिक बढ़ेगा आपके पास उतना पैसा आएगा।

क्या करें और क्या ना करें?
  • स्वयं अपने Google विज्ञापनों पर क्लिक न करें।
  • किसी अन्य व्यक्ति को अपने Google विज्ञापनों पर क्लिक करने के लिए न कहें।
  • अपने विज्ञापनों के लिए स्थान का चयन सावधानी से करें।
  • इस बात के प्रति सावधान रहें कि आपकी साइट का प्रचार कैसे किया जा रहा है।
  • Google Analytics  का उपयोग करें।  
  • Google विज्ञापन प्रदर्शित करने वाले पृष्ठों/साइटों पर सामग्री प्रतिबंध लागू होते हैं। 
  •  अद्वितीय और प्रासंगिक सामग्री युक्त साइटें बनाएं। 
  • AdSense कोड के साथ छेड़छाड़ न करें.
  • पॉप-अप संकेतों या स्वचालित सॉफ़्टवेयर इंस्टॉलेशन का उपयोग न करें। 
  • Google ट्रेडमार्क का सम्मान करे।

आपकी वेबसाइट पर दिख रहे विज्ञापनों पर यदि  किसी पाठक ने क्लिक किया तो इस क्लिक के लिए गूगल विज्ञापन देने वाली कम्पनी से पैसे लेगा और इस आय का एक हिस्सा आपको भी देगा। आप यदि यह जानना चाहें  कि आपको कितना हिस्सा मिलता है तो इसका जवाब कोई नहीं बता सकता। गूगल यह जानकारी किसी से साझा नहीं करता है। किसी विज्ञापनकर्ता से गूगल खुद कितने पैसे लेता है, आपकी कमाई भी इसी बात पर निर्भर करती है। ज़ाहिर है कि गूगल सभी कम्पनियों से एक जैसे पैसे नहीं लेता। इसलिए किसी विज्ञापन पर क्लिक होने की स्थिति में आपको जहां अधिकतम 4 डॉलर भी मिल सकते हैं और किसी अन्य क्लिक पर 0.006 डॉलर भी!


कुछ प्रश्नों का जवाब:

प्रश्न : मेरे ब्लॉग मे EARNING  टैब नहीं दिख रहा।
उत्तर: आप अपने ब्लॉग की सेटिंग में जाकर हिन्दी की जगह English सेट कर लें आपको टैब दिखने लगेगा। चूंकि अभी अभी यह गूगल ने परिवर्तन करने मे समय लगेगा। गूगल वैसे भी एडसेंस के एकाउंट रेवड़ी की तरह कभी नहीं बांटता है। इसलिए धैर्य के साथ पोस्ट्स करते रहें जल्द ही आपको विज्ञापन दिखना शुरू हो सकते हैं।  स्क्रीनिंग के बाद एक एक कर ब्लॉग दिखते रहेंगे। ऐसा मेरा अनुमान है।

प्रश्न : एडसेंस पॉलिसी और उसकी नीतियों के बारे में कैसे जाने?
उत्तर:  आप यहाँ जाकर विस्तार से गूगल एडसेंस की नीति पढ़ सकते हैं।



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अक्सर शिक्षा का सवाल आते ही कई तरह के विचार आते हैं और यह विचार ही भविष्य की रणनीति का सबब भी बनते है या या यूं कहूँ कि  बनना ही चाहिए। ऐसे विचार लेकर कहने वाली ने कहानी गढ़ी। कहानी के कथ्य को पूरे शैक्षिक परिदृश्य मे समझने के बजाय कक्षा शिक्षण में उस छूटे हुए पर सबसे महत्वपूर्ण पहलू की तरह लेना चाहिए, जिसके बारे में अक्सर बात छूट जाती है। वैसे इस कहानी के कथ्य का सर्वमान्यीकरण नहीं किया जाना चाहिए फिर भी जो संदेश इस कहानी के रूप मे कहने का प्रयास है, मुख्य फोकस उस पर कायम रहना चाहिए, पढ़ने के बाद भी। मुझे लगता है कि लेखक के रूप मे एक  कहानीकार की यह दक्षता होती है।  ~ प्रवीण त्रिवेदी

स्कन्द शुक्ल
स्कन्द शुक्ल वैसे तो उच्चशिक्षाधकारी के रूप मे कार्यरत हैं, लेकिन उनसे रूबरू हुआ, उनके साहित्यिक और लेखन क्षमता के चलते। एक अच्छे पाठक के रूप मे अक्सर उनके लेख और अखबारों मे छपे कालम पढ़ता रहता था। हालांकि अक्सर वह अँग्रेजी मे होते थे। और जैसे ही उन्होने पहली बार हिन्दी मे लिखा, मैंने उनसे यह मौका छीन लिया बिना इजाजत यहाँ कहानी को चिपकाने का। आखिर यह कहने से क्या गुरेज कि अगर जिसको लक्ष्य बनाकर कहानी लिखी जाये, उन तक ही असर ना पहुंचे तो फिर असर होगा? मुझे उम्मीद है कि वह आगे भी ऐसी कहानियाँ लिखने का उत्साह बनाए रख पाएंगे। उनका लिखे और छापे हुए आलेख आप उनके ब्लॉग  'लंचरूम'  में जाकर देख सकते हैं। 
'एहसास'


निस्सीम फैला ऊसर और उस पर पसरी बैसाख की अंतहीन धूप। यह मेरे जनपद का सुदूर वह क्षेत्र था जहॉ से नगर को उसके विकास के लिए मिलती थी ईंट और, श्रमिक। उस कठिन स्थान पर हुयी थी मेरी तैनाती। मन में कितनी प्रसन्नता थी जब सरकारी विद्यालय मंे शिक्षिका की नौकरी मिली, कितना उत्साह! उत्साह मात्र नौकरी मिलने का नहीं बल्कि उस आत्मविश्वास का , उस आशावाद का जो युवावस्था को परिभाषित करता है। 
विद्यालय शहर में मेरे निवास स्थान से लगभग 30 किलोमीटर दूर था। बस तथा टैम्पो यात्रा के बाद लगभग एक किलोमीटर की पदयात्रा कर वहाँ पहुचना होता था। बहुत कुछ करने की इच्छा थी और विश्वास था उन नकारात्मक स्थितियों को बदल देने की जो हम सुनते, पढ़ते रहते है। यह केवल अपने दायित्वों के बोध के कारण नहीं था वरन् मन में छोटे बच्चों के प्रति स्वाभाविक स्नेह के कारण भी था।
वास्तविक विद्यालयीय व्यवस्था और शिक्षा तन्त्र से मेरा प्रथम साक्षात्कार- दो कक्षीय, चहारदिवारी विहीन भवन; कुछ दूर पर एक हैण्डपम्प और पास ही शौचालय, जिसके दरवाजों पर ताला जड़ा था। बुजुर्ग प्रधानाध्यापक ने मेरे अभिवादन का उत्तर दिया और एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। आवाज सुनकर बगल के कक्ष से एक और अध्यापिका आ गयीं। परिचय हुआ तो मालूम चला कि प्रधानाध्यापक सेवा निवृत्त होने वाले है, और मेरी साथी अध्यापिका भी शहर से ही आती हैं जहाँ उनके पति सरकारी अधिकारी थे।
‘‘ चलो बहुत अच्छा हुआ कि तुम यहां आ गयी,’’ उन्होंने कहा, ‘‘ मैं तो सोच रही थी हेडमास्टर साहब के रिटायरमेन्ट के बाद कैसे चलेगा। इतना तो काम है- पंजिकायंे तैयार करना, ढे़र सारे व्ययों का हिसाब-किताब रखना, मध्याहन भोजन, यूनिफार्म, न जाने क्या क्या और दिक्कते? बाथरूम तक तो है नहीं’’, वो बोलती ही जा रही थी। ‘‘ बच्चे कितने है?,’’ मैने पूछा क्योंकि विभिन्न उम्र के मुश्किल से 10 बच्चे ही बाहर मैदान में दिख रहे थे। बताया गया कि है तो 100 बच्चे नामांकित परन्तु इन दिनों विवाह-लग्न और गेंहू कटाई का समय होने के कारण बहुत कम बच्चे विद्यालय आ रहे हैं।
मैने अपने चारो ओर देखा- चमक खोती, बेरंग होती सफेद दीवारें जिन पर कुछ आदर्श वाक्य लिखे थे। सचमुच, टैगोर का विवरण- ‘‘ बेयर व्हाइट वाल्स स्टेयरिंग लाइक आई-बाल्स ऑफ द डेड (मृतक की आँखों की तरह घूरती सूनी सफेद दीवारें)- कितना सटीक बैठता था। आज भी!
‘‘ असल में पढ़ने में इनका मन ही नहीं लगता’’, साथी अध्यापिका ने कहा। ‘‘ लाख समझाओं, पाठ समझ में ही नहीं आता, ‘‘प्रधानाध्यापक ने जोड़ा। मैने उड़ती सी नजर बाहर डाली। किचेन-शेड में मध्याहन भोजन की तैयारी प्रारम्भ हो रही थी। कुछ बच्चें वहीं ताक-झांक कर रहे थे।‘‘ कितने ही बच्चे होंगे जिनका दिन का प्रथम भोजन यही मध्याहन-भोजन होता होगा,’’ मैंने सोचा। मास्लो की आवश्यकता-पदानुक्रम का ख्याल न जाने क्यों अचानक आ गया।
विद्यालय का समय हो चला था। हम सब बाहर चले आये, प्रार्थना जो होनी थी। बच्चों की संख्या 40 के आस पास हो चली थी। विद्यालयीय परिधान में बच्चे आड़ी-तिरछी लगी बटनंे, हाथों में झोला (जिसमें किताबों के साथ किसी-किसी में थाली भी दिख रही थी) और कई उस गर्म मौसम में भी नंगे पैर पंक्तियों में खड़े थे।
प्रार्थना के बाद बच्चे दो कक्षा कक्षों में अपने आप चले गये। मेरे कक्षा-कक्ष में कक्षा 1 और 2 के कुल 15 बच्चे थे टाट-पट्टी पर बैठे हुये। ‘गुड-मार्निंग’ के समवेत स्वर ने मेरा स्वागत किया। अंग्रेजी में अभिवादन का अपना अलग ही प्रभाव होता है। अंग्रेजी का उपयोग न जाने क्यों सुनने वाले को बोलने वाले में ज्ञान का आभास देने लगता है, मैने मन ही मन चुटकी ली। बच्चों की आँखों में मेरे प्रति कोई आकर्षण का भाव नहीं था, हाँ जिज्ञासा अवश्य दिख रही थी। मैने बोला- ‘‘तुम लोग मुझे जानते हो’’? कुछ ने ‘नहीं’ में गर्दन हिलायी, कुछ बस ताकते रहे और शेष अपने में मस्त थे। मैने उन्हें बताया कि मैं उनकी नयी अध्यापिका हूँ। बच्चों के परिचय से मैंने प्रारम्भ किया। उनमें अधिकतर लड़कियाँ थीं। भाइयों के बारे में पूछने पर मालूम हुआ कि कई उसी गाँव के प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ते हैं। सौ प्रतिशत नामांकन का एक पक्ष यह भी है, मुझे मालूम चला। सभी बच्चे आस-पास के क्षेत्र के थे और लगभग सभी के माता-पिता मजदूरी करते थे अथवा गाँव में ही अपने छोटे-मोटे काम से अपनी जीविका चलाते थे।
शिक्षा सत्र का अन्तिम पक्ष चल रहा था अतः मुझे लगता था कि कुछ नया तो पढ़ाना नहीं है बल्कि पूर्व में पढ़ाये गये पाठों की पुनरावृत्ति ही कराना है। पहले से सोची गयी रूप रेखा के अनुसार कार्य आरम्भ किया। परन्तु स्थिति अच्छी नहीं थी। अक्षर ज्ञान अति न्यून- पहचानने की ही समस्या थी, लेखन तो दूर की कौड़ी थी। मैं बच्चों के पास जाकर उनकी पुस्तकें और कॉपी देखने लगी। ऐसा नहीं था कि उन्हें वर्ष भर पढ़ाया ही नहीं गया था, क्योंकि अभ्यास पुस्तिकाओं तथा कापियों पर कुछ कार्य किये गये थे और उन्हें जांचा भी गया था। परन्तु सम्भवतः ऐसा इसलिए था कि शिक्षा अभियान के प्रयासों से इनमें से अधिकतर बच्चे अपने-अपने परिवारों की पहली पीढ़ी थे, जो शिक्षा की डेहरी पर कदम रखे थे। स्वाभाविक है कि घर पर इनका मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं होगा। माँ-बाप यदि थोड़ा बहुत पढ़े लिखे भी होंगे तो भी दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद यह संभव नहीं होगा कि वे यह देख सकें कि बच्चे कुछ पढ़ लिख रहे हैं या नहीं।
बस्तों में बिना कवर चढ़ी पुस्तकें ( कुछ बोध के अभाव में, और कुछ अखबारी कागज के अभाव में ), मुड़ी-तुड़ी पन्नों वाली नोट बुक, खेलने के लिए गिट्टियाँ और कंचे, सस्ती पेन्सिलों ............... यही सब था। देखते-देखते उस प्यारी सी, छोटी से लड़की के पास पंहुची जो कक्षा में सबसे शान्त और थोड़ा अलग सी बैठी थी- एक झोले में ठीक से रखी पुस्तकें और एक पुरानी डायरी, जिसे कॉपी के रूप में प्रयोग किया जा रहा था। अरे वाह! इसमे तो उसने ढे़रों चित्र बना रखे थे। चित्र, जो यह बताने के लिए बहुत थे कि उसमें चित्रकारी की विशेष प्रतिभा थी। पूछने पर बताया कि उसके पिता कुम्हार हैं और माँ बरतनों पर चित्रकारी करती है और, यह भी कि, उसे भी चित्र बनाना अच्छा लगता है।

 "तुम इतनी छोटी हो, इतने सुन्दर चित्र कैसे बना लेती हो "? मेरे प्रशंसा-सिक्त प्रश्न पर उसने बाल सुलभ शर्म के साथ प्यारी सी मुस्कान दी, आँखों में आ रहे अपने बालों को हाथ से पीछे कर अवधी में बोली- " जब नाय आवत तो हमार अम्मा अंगुरी पकिड़ के बनवावथीं "। 
मैं चित्रों को ध्यान से देख रही थी- नदी पहाड़ युक्त सीनरी, पशु-पक्षी, चाक पर कुम्हार, डाक्टर... मैने पूछा- ‘अरे! टीचर का तुमने कोई चित्र नहीं बनाया?’ उसने ‘नहीं ’ में गर्दन हिलाई। आखिर क्यों, मैंने पूछा, ‘‘ क्या तुम्हें अध्यापक अच्छे नहीं लगते?’’ उसने फिर से ‘नहीं’ में गर्दन हिलाई। ‘‘क्यों नहीं अच्छे लगते? मैंने आश्चर्य से मुस्कुराते हुए पूछा। और वो- जैसे बरस पड़ी- ‘‘ काहे कि, मैडम जी तो पियार करतिन नाहीं। छूबौ नाहीं करतिन। एक दिन दौड़त-दौड़त हम गिर ग रहे, खून निकलत रहा तो दूरै से कहत रहिन- ‘उठाओ उठाओ’। एकौ पग नाहीं बढ़िन। डाक्टर मुला पियार से हाथ पकिड़ के चुप कराइन, जरकौ दर्द नाहिं भा दवा लगाइन...’’ वो बोलती जा रही थी और सभी बच्चे हम दोनों को ध्यान से देख रहे थे।

स्नेहिल स्पर्श का महत्व जो बड़े-बड़े व्याख्यान नहीं स्पष्ट कर सके थे वो मेरे अन्दर तक पैठता जा रहा था। बचपन की स्मृतियों में सम्मिलित हाथ पकड़ कर अक्षर लिखना सिखाने वाली , अच्छा लिखने पर गाल छूकर शाबासी देने वाली और खराब लिखने पर प्यार भरी डांट पिलाने वाली टीचर का चित्र आँखों के सामने आ गया. ‘चाइल्ड-सेन्ट्रिक’,‘ चाइल्ड-फ्रेन्डली’ जैसे शब्द हवा में तैर रहे थे पर ‘चाइल्ड- लविंग’ कहीं दिख नहीं रहा था ! 

और मेरे मन में, बार-बार यह प्रश्न आ रहा था कि, कहीं ऐसा तो नहीं कि, इन विद्यालयों में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सामाजिक-आर्थिक अन्तर हमें ‘ह्यूमेन’, यानी इस सोपान में अपने से नीचे के प्रति दयावान और ‘पेट्रन’, होने का भाव तो ले आने कि अनुमति देता है परन्तु, ’अफेक्शनेट’ या स्नेहमयी होने के पहले ही ठिठक जाता है ?


यह कहानी कुछ दिन पहले प्रतिष्ठित अखबार "दैनिक जागरण" में छप चुकी है। जिसे आप इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं।

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कोई आज अपने गुरु को नमन कर रहा तो कोई आज ताके बैठा अपने गुरु से हिसाब किताब निबटाने को। अक्सर प्राइमरी का मास्टर नाम को लेकर आपत्तियाँ आती ही रहती हैं। गुरु, शिक्षक को ज्यादा उम्दा भाषाई दर्जा देने वाले साथी "ओए गुरु" "का है गुरु" की बदली मानसिकता को भी पहचानते ही होंगे? कई बार हम कहते आयें हैं कि आप अपने आपको चाहे जितना अच्छा नाम नाम लेकर पुकारे जाने की कोशिश करें, लेकिन समय ऐसा कि दो चार उदाहरणों पर बनी राय लाखों पर राज करती है। मित्रों यह समय गिरावट का समय है। जितनी बड़ी गिरावट उतनी बड़ी चुनौती हमारे सामने।

प्राइमरी का मास्टर एक भाषाई चुनौती थी उन विश्वासों के प्रति जो हमें नकारा और निकम्मा माने जाने और सिद्ध किए जाने की भरपूर कोशिश करते रहते हैं। आत्ममुग्धता ना समझा जाये तो कहने में कोई गुरेज नहीं कि बहुत हद तक हम अपना प्रतिरोध दर्ज कराने मे सफल रहें है। आज की पूरी शिक्षा व्यवस्था शिक्षकों पर अविश्वास पर टिकी है। शिक्षा के बदलते अर्थशास्त्र, जिसमें शिक्षक का वेतन प्रमुख अंग है, के लिए इस अविश्वास को सुढृढ़ करना जरूरी है। यह व्यवस्था शिक्षकों से संवाद पर भरोसा नहीं करती। अब ऐसी व्यवस्था मे क्या और कैसे करना आपके जिम्मे नहीं लेकिन असफल परिणाम आपके जिम्मे थोपे जाने की एक सोची समझीं साजिश चल रही है।


चाहे जितना हम अपनी शैक्षिक प्रणाली को कोस् ले उसके बावजूद हर क्षेत्र में सफल व्यक्ति के पीछे एक शिक्षक की भूमिका देखी जा सकती है । एक स्कूल में तमाम तरह के संसाधनों के बावजूद एक शिक्षक के न होने पर वह स्कूल नहीं चल सकता है । दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण हैं, और रोज ऐसे हजारों उदाहरण गढे जा रहे हैं ,जंहा बिना संसाधनों के शिक्षक आज भी अपने बच्चों को गढ़ने में लगे हैं। वास्तव में आज के प्रदूषित परिवेश में यह कार्य समाज में आई गिरावट के बावजूद हो रहा है ,इसे तो दुनिया का हर निराशावादी व्यक्ति को भी मानना पड़ेगा ।

ऐसी बड़ी चुनौतियों के सामने आपकी तैयारी भी बड़ी होनी चाहिए। साथियों आपको हमेशा समय से दो कदम आगे रहना होगा। उन्हें दुनिया भर में हो रहे परिवर्तनों की समझ रखनी होगी और उसके अनुरूप नई पीढ़ी को तैयार करना होगा। यकीन मानिए यदि हम ऐसा करने मे सक्षम रह सके तो परिवर्तन के वाहक हम होंगें।

अपने सभी गुरुओं, शिक्षकों, मास्टरों और सीख देने वालो को नमन करते हुए।
सादर !

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एक निवेदन ब्लॉगर और सोशल मीडिया पर सक्रिय मित्रों से!


प्रो0 अनीता कुमार जी, मुम्बई के एक महाविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं। हाल फिलहाल उन्होने बातचीत और संदेश के माध्यम से बतलाया कि वह वे हिंदी ब्लॉगरों के संबंध में मनोविज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी कर रही हैं जिसके लिए उन्हें आप सभी चिट्ठाकार मित्रों का अभिमत चाहिएऔर उनका विषय है - "हिन्दी ब्लॉगर"।

अनीता कुमार जी हिन्दी ब्लॉगर्स के व्यक्तित्व और ब्लॉग चलाने के कारण जानने की कौशिश कर रही हैं। जिसमे तीन भाग हैं-
  • (1) व्यक्तिगत सूचना
  • (2) व्यक्तित्व प्रश्नावली
  • (3) प्रेरणा प्रश्नावली.
इस शोध के लिए उन्होंने एक ऑनलाइन सर्वे / प्रश्नावली तैयार की है, जिसे सिर्फ आपको टिक करते हुए भरना है। आप सभी से निवेदन है कि  है कि आप अपना मत/ राय अवश्य प्रदान करें।  इसके लिए अनीता जी ने तीन अलग अलग पृष्ठों का एक ऑनलाइन सर्वे बनाया है, जिसे आप तत्काल ऑनलाइन भर कर उनके इस  हिन्दी ब्लोग्गेर्स के शोध में न केवल भरपूर मदद कर सकते हैं, बल्कि हिंदी ब्लॉगरों के विषय में भी और अधिक मनोवैज्ञानिक रूप से समझे जाने की इस प्रक्रिया मे सहयोग कर सकते हैं।  कृपया सीधे सर्वे में जा कर अपना अभिमत दर्ज कराना चाहते हैं तो लिंक है - http://www.surveymonkey.com/s/GDM9KD3




कृपया ध्यान रखें कि यह सर्वे 3 पृष्ठों में फैला है, अतः कृपया कोई भी पृष्ठ रिक्त न छोड़े। 
अपने शोध हेतु उन्हें कम से कम 300 हिन्दी ब्लॉगर्स के सर्वे की आवश्यकता है।  इस मनोवैज्ञानिक शोध में उन्हें भी शामिल किया जा रहा है, जो ब्लॉगर्स नहीं हैं, लेकिन इंटरनेट/फेसबुक पर सक्रिय हैं।  यदि वाकई में आप एक गंभीर हिन्दी ब्लॉगर हैं, तो कृपया तीन  श्रेणियों में विभाजित इस सर्वे को ऑनलाइन भरकर जमा करें व इनकी मदद करें।

सभी हिन्दी ब्लॉगर मित्रों से भी निवेदन है कि अगर हो सके तो अपने जान पहचान वाले अन्य हिन्दी चिठ्ठाकारों को भी लिंक भेज कर मेरी तरफ़ से अनुरोध करें कि वो भी भर दें तो बड़ी कृपा होगी। आशा है आप निराश नहीं करेगें धन्यवाद।  


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