Nov 27, 2014

बुजुर्गो का तिरस्कार, कौन जिम्मेदार

हमारा समाज भले ही मातृ देवो भव और पितृ देवो भव की माला जपता रहता है, लेकिन बुजुर्गो के हालात पर संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय समाज में बुजुर्गो को परिवार से मिलने वाले सम्मान में कमी आती जा रही है। अधिकतर भारतीय बुजुर्ग अपने ही घर में उपेक्षित और एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं।
देश में बुजुर्गो की आबादी तेजी से बढ़ ही रही है। पिछले एक दशक में भारत में वयोवृद्ध लोगों की आबादी 40 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। आगे आनेवाले दशकों में इसके 45  प्रतिशत की दर से बढ़ने की उम्मीद है। दुनिया के ज्यादातर देशों में बुजुर्गो की संख्या दोगुनी होने में सौ से ज्यादा वर्ष का समय लग गया, लेकिन भारत में सिर्फ 20 वर्षो में ही इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो गई। 

गौरतलब है कि आज आदमी की औसत आयु बढ़कर 70 साल से ज्यादा हो गई है। वर्तमान दौर में बढ़ती हुई महंगाई, परिवार द्वारा क्षमता से ज्यादा खर्च और कर्ज से गड़बड़ाते बजट का प्रभाव बुजुर्गो के जीवन पर भी पड़ रहा है। साथ ही हमारी आर्थिक और वित्तीय नीति भी बुजुर्गो को कोई सहारा नहीं दे पा रही है।

बुजुर्गो की देखभाल में वित्तीय बाधाएं अक्सर आड़े आती हैं। आम तरीके से एक सामान्य परिवार अपने कुल खर्च का लगभग 15 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य और चिकित्सा देखभाल पर खर्च करता है। अगर परिवार में कोई बुजुर्ग सदस्य है तो यह खर्च डेढ़ से दो गुना हो जाता है। इस खर्च में एक बड़ा हिस्सा दवाओं पर खर्च का होता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत दुनिया में सस्ती जेनेरिक दवाओं के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, फिर भी यहां पर दवाओं पर खर्च अधिक है। 



सरकारों ने बुजुर्गो को पेंशन की सुविधा दी है, पर वह भी नाकाफी साबित हो रही है। केंद्र सरकार द्वारा वृद्धों के भरण-पोणण के लिए कानून बनाए गए हैं, मगर वे फाइलों की धूल चाट रहे हैं। नतीजन लोग कानूनों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। सरकार को सख्ती से ऐसे कानून लागू करने चाहिए, ताकि वृद्धों को उनका हक मिल सके। जबतक बुजुर्गो को उनका सम्मान नहीं मिलेगा, तबतक रस्मी तौर पर हर साल वृद्ध दिवस मनाने की कोई सार्थकता नहीं होगी।  

प्रत्येक वर्ष 1 अक्टूबर को विश्व वृद्ध दिवस मनाया जाता है, मगर ऐसे आयोजन औपचारिकता भर रह गए हैं। बुजुर्ग किसी दूसरे द्वारा नहीं, बल्कि अपनों के कारण ही उपेक्षित हैं। शायद यह उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन बच्चों के लिए अपना पेट काटकर उनका पालन पोषण किया, आज वही  उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। 

यह भी देखने में आता है कि गरीब लोग तो माता-पिता और अपने बुजुर्गो की अच्छी सेवा करते हैं, मगर साधन संपन्न लोगों द्वारा आज बुजुर्गो को ओल्ड एज होम तथा सरकार द्वारा बनाए गए वृद्ध आश्रमों के हवाले कर दिया जा रहा है। कुछ बुजुर्ग तो घर में ही कैद होकर रह गए हैं। वे गुमनामी के अंधरे में जीने को मजबूर हैं।

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Nov 18, 2014

एहसास

अक्सर शिक्षा का सवाल आते ही कई तरह के विचार आते हैं और यह विचार ही भविष्य की रणनीति का सबब भी बनते है या या यूं कहूँ कि  बनना ही चाहिए। ऐसे विचार लेकर कहने वाली ने कहानी गढ़ी। कहानी के कथ्य को पूरे शैक्षिक परिदृश्य मे समझने के बजाय कक्षा शिक्षण में उस छूटे हुए पर सबसे महत्वपूर्ण पहलू की तरह लेना चाहिए, जिसके बारे में अक्सर बात छूट जाती है। वैसे इस कहानी के कथ्य का सर्वमान्यीकरण नहीं किया जाना चाहिए फिर भी जो संदेश इस कहानी के रूप मे कहने का प्रयास है, मुख्य फोकस उस पर कायम रहना चाहिए, पढ़ने के बाद भी। मुझे लगता है कि लेखक के रूप मे एक  कहानीकार की यह दक्षता होती है।

स्कन्द शुक्ल
स्कन्द शुक्ल वैसे तो उच्चशिक्षाधकारी के रूप मे कार्यरत हैं, लेकिन उनसे रूबरू हुआ, उनके साहित्यिक और लेखन क्षमता के चलते। एक अच्छे पाठक के रूप मे अक्सर उनके लेख और अखबारों मे छपे कालम पढ़ता रहता था। हालांकि अक्सर वह अँग्रेजी मे होते थे। और जैसे ही उन्होने पहली बार हिन्दी मे लिखा, मैंने उनसे यह मौका छीन लिया बिना इजाजत यहाँ कहानी को चिपकाने का। आखिर यह कहने से क्या गुरेज कि अगर जिसको लक्ष्य बनाकर कहानी लिखी जाये, उन तक ही असर ना पहुंचे तो फिर असर होगा? मुझे उम्मीद है कि वह आगे भी ऐसी कहानियाँ लिखने का उत्साह बनाए रख पाएंगे। उनका लिखे और छापे हुए आलेख आप उनके ब्लॉग  'लंचरूम'  में जाकर देख सकते हैं। 
'एहसास'


निस्सीम फैला ऊसर और उस पर पसरी बैसाख की अंतहीन धूप। यह मेरे जनपद का सुदूर वह क्षेत्र था जहॉ से नगर को उसके विकास के लिए मिलती थी ईंट और, श्रमिक। उस कठिन स्थान पर हुयी थी मेरी तैनाती। मन में कितनी प्रसन्नता थी जब सरकारी विद्यालय मंे शिक्षिका की नौकरी मिली, कितना उत्साह! उत्साह मात्र नौकरी मिलने का नहीं बल्कि उस आत्मविश्वास का , उस आशावाद का जो युवावस्था को परिभाषित करता है। 
विद्यालय शहर में मेरे निवास स्थान से लगभग 30 किलोमीटर दूर था। बस तथा टैम्पो यात्रा के बाद लगभग एक किलोमीटर की पदयात्रा कर वहाँ पहुचना होता था। बहुत कुछ करने की इच्छा थी और विश्वास था उन नकारात्मक स्थितियों को बदल देने की जो हम सुनते, पढ़ते रहते है। यह केवल अपने दायित्वों के बोध के कारण नहीं था वरन् मन में छोटे बच्चों के प्रति स्वाभाविक स्नेह के कारण भी था।
वास्तविक विद्यालयीय व्यवस्था और शिक्षा तन्त्र से मेरा प्रथम साक्षात्कार- दो कक्षीय, चहारदिवारी विहीन भवन; कुछ दूर पर एक हैण्डपम्प और पास ही शौचालय, जिसके दरवाजों पर ताला जड़ा था। बुजुर्ग प्रधानाध्यापक ने मेरे अभिवादन का उत्तर दिया और एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। आवाज सुनकर बगल के कक्ष से एक और अध्यापिका आ गयीं। परिचय हुआ तो मालूम चला कि प्रधानाध्यापक सेवा निवृत्त होने वाले है, और मेरी साथी अध्यापिका भी शहर से ही आती हैं जहाँ उनके पति सरकारी अधिकारी थे।
‘‘ चलो बहुत अच्छा हुआ कि तुम यहां आ गयी,’’ उन्होंने कहा, ‘‘ मैं तो सोच रही थी हेडमास्टर साहब के रिटायरमेन्ट के बाद कैसे चलेगा। इतना तो काम है- पंजिकायंे तैयार करना, ढे़र सारे व्ययों का हिसाब-किताब रखना, मध्याहन भोजन, यूनिफार्म, न जाने क्या क्या और दिक्कते? बाथरूम तक तो है नहीं’’, वो बोलती ही जा रही थी। ‘‘ बच्चे कितने है?,’’ मैने पूछा क्योंकि विभिन्न उम्र के मुश्किल से 10 बच्चे ही बाहर मैदान में दिख रहे थे। बताया गया कि है तो 100 बच्चे नामांकित परन्तु इन दिनों विवाह-लग्न और गेंहू कटाई का समय होने के कारण बहुत कम बच्चे विद्यालय आ रहे हैं।
मैने अपने चारो ओर देखा- चमक खोती, बेरंग होती सफेद दीवारें जिन पर कुछ आदर्श वाक्य लिखे थे। सचमुच, टैगोर का विवरण- ‘‘ बेयर व्हाइट वाल्स स्टेयरिंग लाइक आई-बाल्स ऑफ द डेड (मृतक की आँखों की तरह घूरती सूनी सफेद दीवारें)- कितना सटीक बैठता था। आज भी!
‘‘ असल में पढ़ने में इनका मन ही नहीं लगता’’, साथी अध्यापिका ने कहा। ‘‘ लाख समझाओं, पाठ समझ में ही नहीं आता, ‘‘प्रधानाध्यापक ने जोड़ा। मैने उड़ती सी नजर बाहर डाली। किचेन-शेड में मध्याहन भोजन की तैयारी प्रारम्भ हो रही थी। कुछ बच्चें वहीं ताक-झांक कर रहे थे।‘‘ कितने ही बच्चे होंगे जिनका दिन का प्रथम भोजन यही मध्याहन-भोजन होता होगा,’’ मैंने सोचा। मास्लो की आवश्यकता-पदानुक्रम का ख्याल न जाने क्यों अचानक आ गया।
विद्यालय का समय हो चला था। हम सब बाहर चले आये, प्रार्थना जो होनी थी। बच्चों की संख्या 40 के आस पास हो चली थी। विद्यालयीय परिधान में बच्चे आड़ी-तिरछी लगी बटनंे, हाथों में झोला (जिसमें किताबों के साथ किसी-किसी में थाली भी दिख रही थी) और कई उस गर्म मौसम में भी नंगे पैर पंक्तियों में खड़े थे।
प्रार्थना के बाद बच्चे दो कक्षा कक्षों में अपने आप चले गये। मेरे कक्षा-कक्ष में कक्षा 1 और 2 के कुल 15 बच्चे थे टाट-पट्टी पर बैठे हुये। ‘गुड-मार्निंग’ के समवेत स्वर ने मेरा स्वागत किया। अंग्रेजी में अभिवादन का अपना अलग ही प्रभाव होता है। अंग्रेजी का उपयोग न जाने क्यों सुनने वाले को बोलने वाले में ज्ञान का आभास देने लगता है, मैने मन ही मन चुटकी ली। बच्चों की आँखों में मेरे प्रति कोई आकर्षण का भाव नहीं था, हाँ जिज्ञासा अवश्य दिख रही थी। मैने बोला- ‘‘तुम लोग मुझे जानते हो’’? कुछ ने ‘नहीं’ में गर्दन हिलायी, कुछ बस ताकते रहे और शेष अपने में मस्त थे। मैने उन्हें बताया कि मैं उनकी नयी अध्यापिका हूँ। बच्चों के परिचय से मैंने प्रारम्भ किया। उनमें अधिकतर लड़कियाँ थीं। भाइयों के बारे में पूछने पर मालूम हुआ कि कई उसी गाँव के प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ते हैं। सौ प्रतिशत नामांकन का एक पक्ष यह भी है, मुझे मालूम चला। सभी बच्चे आस-पास के क्षेत्र के थे और लगभग सभी के माता-पिता मजदूरी करते थे अथवा गाँव में ही अपने छोटे-मोटे काम से अपनी जीविका चलाते थे।
शिक्षा सत्र का अन्तिम पक्ष चल रहा था अतः मुझे लगता था कि कुछ नया तो पढ़ाना नहीं है बल्कि पूर्व में पढ़ाये गये पाठों की पुनरावृत्ति ही कराना है। पहले से सोची गयी रूप रेखा के अनुसार कार्य आरम्भ किया। परन्तु स्थिति अच्छी नहीं थी। अक्षर ज्ञान अति न्यून- पहचानने की ही समस्या थी, लेखन तो दूर की कौड़ी थी। मैं बच्चों के पास जाकर उनकी पुस्तकें और कॉपी देखने लगी। ऐसा नहीं था कि उन्हें वर्ष भर पढ़ाया ही नहीं गया था, क्योंकि अभ्यास पुस्तिकाओं तथा कापियों पर कुछ कार्य किये गये थे और उन्हें जांचा भी गया था। परन्तु सम्भवतः ऐसा इसलिए था कि शिक्षा अभियान के प्रयासों से इनमें से अधिकतर बच्चे अपने-अपने परिवारों की पहली पीढ़ी थे, जो शिक्षा की डेहरी पर कदम रखे थे। स्वाभाविक है कि घर पर इनका मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं होगा। माँ-बाप यदि थोड़ा बहुत पढ़े लिखे भी होंगे तो भी दिन भर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद यह संभव नहीं होगा कि वे यह देख सकें कि बच्चे कुछ पढ़ लिख रहे हैं या नहीं।
बस्तों में बिना कवर चढ़ी पुस्तकें ( कुछ बोध के अभाव में, और कुछ अखबारी कागज के अभाव में ), मुड़ी-तुड़ी पन्नों वाली नोट बुक, खेलने के लिए गिट्टियाँ और कंचे, सस्ती पेन्सिलों ............... यही सब था। देखते-देखते उस प्यारी सी, छोटी से लड़की के पास पंहुची जो कक्षा में सबसे शान्त और थोड़ा अलग सी बैठी थी- एक झोले में ठीक से रखी पुस्तकें और एक पुरानी डायरी, जिसे कॉपी के रूप में प्रयोग किया जा रहा था। अरे वाह! इसमे तो उसने ढे़रों चित्र बना रखे थे। चित्र, जो यह बताने के लिए बहुत थे कि उसमें चित्रकारी की विशेष प्रतिभा थी। पूछने पर बताया कि उसके पिता कुम्हार हैं और माँ बरतनों पर चित्रकारी करती है और, यह भी कि, उसे भी चित्र बनाना अच्छा लगता है।

 "तुम इतनी छोटी हो, इतने सुन्दर चित्र कैसे बना लेती हो "? मेरे प्रशंसा-सिक्त प्रश्न पर उसने बाल सुलभ शर्म के साथ प्यारी सी मुस्कान दी, आँखों में आ रहे अपने बालों को हाथ से पीछे कर अवधी में बोली- " जब नाय आवत तो हमार अम्मा अंगुरी पकिड़ के बनवावथीं "। 
मैं चित्रों को ध्यान से देख रही थी- नदी पहाड़ युक्त सीनरी, पशु-पक्षी, चाक पर कुम्हार, डाक्टर... मैने पूछा- ‘अरे! टीचर का तुमने कोई चित्र नहीं बनाया?’ उसने ‘नहीं ’ में गर्दन हिलाई। आखिर क्यों, मैंने पूछा, ‘‘ क्या तुम्हें अध्यापक अच्छे नहीं लगते?’’ उसने फिर से ‘नहीं’ में गर्दन हिलाई। ‘‘क्यों नहीं अच्छे लगते? मैंने आश्चर्य से मुस्कुराते हुए पूछा। और वो- जैसे बरस पड़ी- ‘‘ काहे कि, मैडम जी तो पियार करतिन नाहीं। छूबौ नाहीं करतिन। एक दिन दौड़त-दौड़त हम गिर ग रहे, खून निकलत रहा तो दूरै से कहत रहिन- ‘उठाओ उठाओ’। एकौ पग नाहीं बढ़िन। डाक्टर मुला पियार से हाथ पकिड़ के चुप कराइन, जरकौ दर्द नाहिं भा दवा लगाइन...’’ वो बोलती जा रही थी और सभी बच्चे हम दोनों को ध्यान से देख रहे थे।

स्नेहिल स्पर्श का महत्व जो बड़े-बड़े व्याख्यान नहीं स्पष्ट कर सके थे वो मेरे अन्दर तक पैठता जा रहा था। बचपन की स्मृतियों में सम्मिलित हाथ पकड़ कर अक्षर लिखना सिखाने वाली , अच्छा लिखने पर गाल छूकर शाबासी देने वाली और खराब लिखने पर प्यार भरी डांट पिलाने वाली टीचर का चित्र आँखों के सामने आ गया. ‘चाइल्ड-सेन्ट्रिक’,‘ चाइल्ड-फ्रेन्डली’ जैसे शब्द हवा में तैर रहे थे पर ‘चाइल्ड- लविंग’ कहीं दिख नहीं रहा था ! 

और मेरे मन में, बार-बार यह प्रश्न आ रहा था कि, कहीं ऐसा तो नहीं कि, इन विद्यालयों में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच सामाजिक-आर्थिक अन्तर हमें ‘ह्यूमेन’, यानी इस सोपान में अपने से नीचे के प्रति दयावान और ‘पेट्रन’, होने का भाव तो ले आने कि अनुमति देता है परन्तु, ’अफेक्शनेट’ या स्नेहमयी होने के पहले ही ठिठक जाता है ?


यह कहानी कुछ दिन पहले प्रतिष्ठित अखबार "दैनिक जागरण" में छप चुकी है। जिसे आप इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं।

 पढ़ने के लिए क्लिक करके बड़ा देख सकते  हैं !

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Sep 5, 2014

साल का एक दिन और मन गया शिक्षक दिवस! मगर सवाल हैं गंभीर

कोई आज अपने गुरु को नमन कर रहा तो कोई आज ताके बैठा अपने गुरु से हिसाब किताब निबटाने को। अक्सर प्राइमरी का मास्टर नाम को लेकर आपत्तियाँ आती ही रहती हैं। गुरु, शिक्षक को ज्यादा उम्दा भाषाई दर्जा देने वाले साथी "ओए गुरु" "का है गुरु" की बदली मानसिकता को भी पहचानते ही होंगे? कई बार हम कहते आयें हैं कि आप अपने आपको चाहे जितना अच्छा नाम नाम लेकर पुकारे जाने की कोशिश करें, लेकिन समय ऐसा कि दो चार उदाहरणों पर बनी राय लाखों पर राज करती है। मित्रों यह समय गिरावट का समय है। जितनी बड़ी गिरावट उतनी बड़ी चुनौती हमारे सामने।

प्राइमरी का मास्टर एक भाषाई चुनौती थी उन विश्वासों के प्रति जो हमें नकारा और निकम्मा माने जाने और सिद्ध किए जाने की भरपूर कोशिश करते रहते हैं। आत्ममुग्धता ना समझा जाये तो कहने में कोई गुरेज नहीं कि बहुत हद तक हम अपना प्रतिरोध दर्ज कराने मे सफल रहें है। आज की पूरी शिक्षा व्यवस्था शिक्षकों पर अविश्वास पर टिकी है। शिक्षा के बदलते अर्थशास्त्र, जिसमें शिक्षक का वेतन प्रमुख अंग है, के लिए इस अविश्वास को सुढृढ़ करना जरूरी है। यह व्यवस्था शिक्षकों से संवाद पर भरोसा नहीं करती। अब ऐसी व्यवस्था मे क्या और कैसे करना आपके जिम्मे नहीं लेकिन असफल परिणाम आपके जिम्मे थोपे जाने की एक सोची समझीं साजिश चल रही है।


चाहे जितना हम अपनी शैक्षिक प्रणाली को कोस् ले उसके बावजूद हर क्षेत्र में सफल व्यक्ति के पीछे एक शिक्षक की भूमिका देखी जा सकती है । एक स्कूल में तमाम तरह के संसाधनों के बावजूद एक शिक्षक के न होने पर वह स्कूल नहीं चल सकता है । दुनिया में ऐसे हजारों उदाहरण हैं, और रोज ऐसे हजारों उदाहरण गढे जा रहे हैं ,जंहा बिना संसाधनों के शिक्षक आज भी अपने बच्चों को गढ़ने में लगे हैं। वास्तव में आज के प्रदूषित परिवेश में यह कार्य समाज में आई गिरावट के बावजूद हो रहा है ,इसे तो दुनिया का हर निराशावादी व्यक्ति को भी मानना पड़ेगा ।

ऐसी बड़ी चुनौतियों के सामने आपकी तैयारी भी बड़ी होनी चाहिए। साथियों आपको हमेशा समय से दो कदम आगे रहना होगा। उन्हें दुनिया भर में हो रहे परिवर्तनों की समझ रखनी होगी और उसके अनुरूप नई पीढ़ी को तैयार करना होगा। यकीन मानिए यदि हम ऐसा करने मे सक्षम रह सके तो परिवर्तन के वाहक हम होंगें।

अपने सभी गुरुओं, शिक्षकों, मास्टरों और सीख देने वालो को नमन करते हुए।
सादर !

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Jul 10, 2014

हिन्दी ब्लॉगर के मनोविज्ञान पर एक सर्वे : आइये दो मिनट समय दे कर इसे भरें

एक निवेदन ब्लॉगर और सोशल मीडिया पर सक्रिय मित्रों से!


प्रो0 अनीता कुमार जी, मुम्बई के एक महाविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं। हाल फिलहाल उन्होने बातचीत और संदेश के माध्यम से बतलाया कि वह वे हिंदी ब्लॉगरों के संबंध में मनोविज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी कर रही हैं जिसके लिए उन्हें आप सभी चिट्ठाकार मित्रों का अभिमत चाहिएऔर उनका विषय है - "हिन्दी ब्लॉगर"।

अनीता कुमार जी हिन्दी ब्लॉगर्स के व्यक्तित्व और ब्लॉग चलाने के कारण जानने की कौशिश कर रही हैं। जिसमे तीन भाग हैं-
  • (1) व्यक्तिगत सूचना
  • (2) व्यक्तित्व प्रश्नावली
  • (3) प्रेरणा प्रश्नावली.
इस शोध के लिए उन्होंने एक ऑनलाइन सर्वे / प्रश्नावली तैयार की है, जिसे सिर्फ आपको टिक करते हुए भरना है। आप सभी से निवेदन है कि  है कि आप अपना मत/ राय अवश्य प्रदान करें।  इसके लिए अनीता जी ने तीन अलग अलग पृष्ठों का एक ऑनलाइन सर्वे बनाया है, जिसे आप तत्काल ऑनलाइन भर कर उनके इस  हिन्दी ब्लोग्गेर्स के शोध में न केवल भरपूर मदद कर सकते हैं, बल्कि हिंदी ब्लॉगरों के विषय में भी और अधिक मनोवैज्ञानिक रूप से समझे जाने की इस प्रक्रिया मे सहयोग कर सकते हैं।  कृपया सीधे सर्वे में जा कर अपना अभिमत दर्ज कराना चाहते हैं तो लिंक है - http://www.surveymonkey.com/s/GDM9KD3




कृपया ध्यान रखें कि यह सर्वे 3 पृष्ठों में फैला है, अतः कृपया कोई भी पृष्ठ रिक्त न छोड़े। 
अपने शोध हेतु उन्हें कम से कम 300 हिन्दी ब्लॉगर्स के सर्वे की आवश्यकता है।  इस मनोवैज्ञानिक शोध में उन्हें भी शामिल किया जा रहा है, जो ब्लॉगर्स नहीं हैं, लेकिन इंटरनेट/फेसबुक पर सक्रिय हैं।  यदि वाकई में आप एक गंभीर हिन्दी ब्लॉगर हैं, तो कृपया तीन  श्रेणियों में विभाजित इस सर्वे को ऑनलाइन भरकर जमा करें व इनकी मदद करें।

सभी हिन्दी ब्लॉगर मित्रों से भी निवेदन है कि अगर हो सके तो अपने जान पहचान वाले अन्य हिन्दी चिठ्ठाकारों को भी लिंक भेज कर मेरी तरफ़ से अनुरोध करें कि वो भी भर दें तो बड़ी कृपा होगी। आशा है आप निराश नहीं करेगें धन्यवाद।  


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Feb 26, 2014

साझा संस्कृति संगम : मीडिया रिपोर्ट्स

साभार अमर उजाला दिनांक  15 फरवरी 2014

साभार अमर उजाला दिनांक  16 फरवरी 2014




साभार दैनिक जागरण 16 फरवरी


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साझा संस्कृति संगम : सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ रचनाकारों का शंखनाद


  • संगमनगरी में सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ रचनाकारों का शंखनाद
  • देश को फासीवाद से बचाने के लिए सभी हों एकजुट
प्रथम दिन
 
जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के आह्वान पर सीमैट सभागार में शुक्रवार को जुटे देश के नामचीन लेखकों, रचनाकारों, संस्कृतिकर्मियों ने सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ शंखनाद किया। मुहिम के तहत उन्होंने इसके खतरों के प्रति आगाह करते हुए इससे जूझने की तरकीब और तरीके भी सुझाए। सभी ने दो टूक कहा कि देश में सांप्रदायिक ताकतों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है, इसे रोका न गया तो पूरा देश, गुजरात की राह समर्पित होगा।
प्रथम सत्र
‘साझा संस्कृति संगम’ के ‘अन्याय जिधर है, उधर शक्ति’ पर केंद्रित उद्घाटन सत्र में प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने कहा, लोकतंत्र के लिए जरूरी शर्त है कि लोगों में भरोसा हो कि वे इसमें हिस्सा लेकर अपने जीवन को बेहतर बना सकेंगे। ऐसा न होने पर ही उनमें निराशा का भाव उपजता है और वे फासीवादी ताकतों के बहकावे में आ जाते हैं। पूंजीवाद मे सभी अपने लिए, अपनी पूंजी के लिए, अपने स्वार्थ के लिए ही लड़ते हैं।

ऐसा कोई समाज तिक ही नहीं सकता है, जिसमे किसी प्रकार का कोई भाईचारा ही ना हो। पूंजीवाद मे हर चीज को कोमोडिटी बना दिया गया है, जाहीर है राजनीति भी अब उसी तर्ज पर हो चली है। इसीलिए पूंजी की व्यवस्था मे ही राजनीति भी अब संलिप्त हो चली है। वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष करते हुए प्रो0 पटनायक ने कहा कि यह जानने के बाद भी कि हर व्यक्ति स्वयं अपने जीवन का भागी-विधाता है, यह जानने के बाद भी वह एक मसीहा का इंतजार करता है। इस मसीहाई पॉलिटिक्स से देश और राजनीति को लंबे अर्थों मे कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है।  नवउदारवाद में विकास के साथ बेरोजगारी भी बढ़ी है। पूंजीवादी व्यवस्था का सिद्धांत प्रत्येक आदमी को अपने स्वार्थ के लिए लड़ने को प्रेरित करता है। 

प्रो0 पटनायक ने एक ऐसे एजेंडे को विकसित करने पर ज़ोर दिया जिसमे सभी को स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था की जा सके। इससे व्यवस्था के प्रति आम आदमी की निराशा को दूर कर उनका विश्वास अर्जित किया जा सकेगा। (प्रो0 प्रभात पटनायक का पूरा आलेख यहाँ पढ़ा जा सकता है। )
मशहूर समाजसेवी तीस्ता सीतलवाड़ ने कहा, सांप्रदायिकता को समझने के लिए जातिवाद को समझना जरूरी है। साजिश के तहत ही आज समाचारों में एकरूपता है। गुजरात में विकास का नारा बेबुनियाद है। फासीवाद एक माहौल बनाता है जिसमें न कोई सवाल कर सके, न ही कोई जवाब मांग सके। पेंग्विन से हिंदुत्व पर प्रकाशित किताब को वापस लेने की घटना फासीवाद का ताजा उदाहरण है। तीस्ता के अनुसार पूंजी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती है, और इस आपाधापी मे मीडिया भी एकाधिकार का शिकार हो गया है। पाठ्यपुस्तकों मे किए गए बदलावों पर सवाल उठाते हुए तीस्ता का कहना था कि इसके जरिये भी नवउदारवादी फासीवाद को बढ़ावा देने का कारी किया जा रहा है।

अध्यक्ष मंडल में शामिल शेखर जोशी, रमेश कुंतल मेघ, जुबैर रिजवी की ओर से प्रोफेसर अकील रिजवी ने कहा, फासीवाद को रोकना मुश्किल जरूर लेकिन नामुमकिन नहीं। हम लेखकों को अपने कलाम और अलफाज के जरिये पूरी ताकत से संघर्ष करने को तत्पर रहना चाहिए। उन्होने चेताया भी कि बिखरते समाज मे परिवर्तन की लड़ाई बहुत आसान नहीं रहने वाली पर फिर भी हमें संगठित हो संघर्ष के लिए तैयार रहना है और  यह समारोह उसी दिशा में एक कोशिश है।
द्वितीय सत्र 
‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’ पर केंद्रित द्वितीय सत्र में जलेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मनमोहन ने कहा, हमें निराश होने की जरूरत नहीं लेकिन हमें कड़ी जांच के साथ ही उनसे आंख मिलाना होगा।संस्कृतिकर्मियों के मध्य परस्पर संवाद बढ़ाने पर ज़ोर देते हुए मनमोहन का कहना था कि पूंजीवादी/ नवउदारवादी राजनीति पर सभी दलों की परस्पर सहमति के बीच वामपंथी राजनीति पर सवाल उठाते हुए जमीनी व वैचारिक संघर्ष को और जोश-ए- खरोश के साथ शुरू करने की बात कही। प्रणयकृष्ण ने कहा कि फासीवाद और सांप्रदायिकता के साथ साथ इसमे सामंतवाद का भी एक छुपा हुआ हिस्सा है। जिसके सटरक रहने व उसके खिलाफ खड़े रहने की व उसको और विकेंद्रीकृत करने की आवश्यकता है।
अली जावेद ने कहा कि आज के सचमुच गंभीर दौर मे लेखक व बुद्धिजीवी ही सबसे बड़े आशा के केंद्र हैं। अपनी लेखनी का इस्तेमाल समाज की बेहतरी के लिए करने का आह्वान किया।  शिवमूर्ति ने कहा, सांप्रदायिकता और जातिवाद, मौजूदा दौर की बड़ी समस्याएं हैं। इनसे लड़ने के लिए सभी को अपने सांस्कृतिक / साहित्यिक साजो सामान के साथ तैयार रहने का आह्वान किया। उनका कहना था कि जातिवाद ‘बोरसी’ की आग की तरह है, जिसे हवा देने वाले उतने साधन संपन्न नहीं जितने सांप्रदायिकता को हवा देने वाले।

अध्यक्ष मडंल की ओर से प्रोफेसर राजेंद्र कुमार ने कहा,
हमें आत्ममुग्ध होने केबजाय संवेदनशील और सरल होकर तैयारी करनी होगी। संघर्ष के रूपों में नए साधनों और तरीकों को शामिल करने की सलाह देते हुए वक्ता का कहना था कि समाज के असंतोष की पक्षधरता के प्रति हमें प्रतिबद्ध होना चाहिए। जनवादी आंदोलनों को बौद्धिकीकरण  के बजाय सरलीकरण पर ज़ोर देना चाहिए व अपने आदर्शों पर ढाल कर जनता के समक्ष प्रस्तुत करने को तैयार रहना चाहिए। मीडिया की भूमिका को बिचौलिया की संज्ञा देते हुए सीधे जनता से जुडने की नसीहत दी। संस्कृति कर्मियों को आत्म-मुग्धता से सबसे बड़ी आवश्यकता है।

तृतीय सत्र 
‘तय करो किस ओर हो तुम’ पर केंद्रित तीसरे सत्र के अध्यक्ष मंडल में वरिष्ठ कथाकर दूधनाथ सिंह, इब्बार रब्बी, आबिद सुहैल,  शामिल थे। वीरेंद्र यादव  ने प्रेमचन्द्र को घृणा का प्रचारक कहे जाने वाले संदर्भ मे प्रश्न  करते हुए कहा कि वर्ण/वर्ग से परे होकर हम लेखक कितना कार्य कर पाये हैं? दलित विमर्श, स्त्री विमर्श व किसानों के विमर्श को लेकर अपने मध्ययुगीन सोच से मुक्त होकर सक्रिय रहने की और बड़ी आवश्यकता है। रचनाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर एक नए खतरे की ओर इशारा करते हुए उनके प्रति और संघर्ष के लिए तैयार करने की जरूरत पर बल दिया।

कामरेड सुभाषिनी अली ने कहा कि
स्त्री को शामिल किए बगैर कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। इसी थीम के साथ आयोजकों को सलाह देते हुए कामरेड वक्ता का कहना था कि राजनीति मे सक्रिय पार्टियां अपनी सुविधा के अनुसार ही सांप्रदायिकता को परिभाषित करते हैं। बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता के अलावा अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता पर अंगुली उठाते हुए उनका कहना था कि अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता बहुसंख्यको की सांप्रदायिकता को खाद-पानी  देने का काम कर रही है। अतः यदि सांप्रदायिकता के खिलाफ सही माने मे लड़ाई लड़नी है तो  हमें दोनों से एक साथ और एक मजबूती से ही लड़ना होगा।

सुभाष गाताडे ने बिलकुल सही समय पर ऐसे आयोजन पर आयोजकों की पीठ थपथपाते हुए कहा कि कोर्ट के सहारे उद्योगपतियों द्वारा तमाम प्रामाणिक बातों पर और पुस्तकों पर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच असहमति की आवाज को और मुखर व प्रखर करने की आवश्यकता है। 

विमर्श के दौरान कामरेड जियाउल हक, राजेश जोशी, आदि ने भी सांप्रदायिकता और फासीवाद को रेखांकित किया। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, संजीव और रेखा अवस्थी ने क्रमशः अलग-अलग सत्रों का संचालन जबकि चंचल चौहान, हरीशचंद्र पांडेय, सुधीर सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया। सम्मेलन में बड़ी संख्या में लेखक, रचनाकार, संस्कृतिकर्मी शामिल थे।

पास किया गया ‘इलाहाबाद प्रस्ताव
साझा संस्कृति संगम में इलाहाबाद प्रस्ताव भी पेश किया और पास किया गया। कहा गया कि स्वतंत्रता, समानता और जनवाद के लिए संघर्ष और कुर्बानियों की अपनी महान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रगतिशील विरासत की शान के मुताबिक इस कठिन समय में भी यकीनन व्यापक जनतांत्रित शक्तियों के साथ एकजुटता से इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। हमें यकीन है कि अपनी प्रतिबद्धता लगन, रचनात्मक कल्पना और आविष्कारशील प्रतिभा की मदद से हम अपनी भूमिका का कारगर ढंग से निर्वाह कर सकेंगे। (आप यह पूरा मसौदा यहाँ पढ़ सकते हैं। )

सांस्कृतिक संध्या
सांस्कृतिक संध्या के तहत अनिल रंजन भौमिक के निर्देशन में इलाहाबाद के समानांतर नाट्य ग्रुप की ओर से सत्यजीत रे की कहानी पर आधारित अख्तर अली कृत ‘असमंजस बाबू’ में राकेश यादव ने प्रभावपूर्ण अभिनय किया। साथ ही हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति की नाट्य प्रस्तुति भी सराही गई। इसी क्रम में कवि सम्मेलन और मुशायरे के तहत रचनाकारों ने बखूबी समय और समाज का सच बयां किया।

किताबों की दुनिया  भी 
जलेस (जनवादी लेखक संघ), प्रलेस (प्रगतिशील लेखक संघ), जसम (जन संस्कृति मंच) के साझा संस्कृति संगम में साहित्य भंडार, लोकभारती प्रकाशन, अंजुम प्रकाशन आदि प्रकाशकों की ओर से किताबों की दुनिया  भी  सजाई गई जहां लेखकों ने पूरे उत्साह के साथ खरीदारी की लेकिन इस दौरान साहित्य भंडार की ओर से ‘पचास, पचास, पचास’ का फार्मूला काफी चर्चित रहा। पाठकों ने योजना को सराहा और किताबें भी खरीदीं। योजना के तहत साहित्य भंडार के पचास वर्ष पूरे होने पर पचास महत्वपूर्ण लेखकों की पचास किताबें, पचास-पचास रुपये में उपलब्ध कराई गईं। इन पचास पुस्तकों में तेइस कहानी संग्रह, सत्रह कविता संग्रह जबकि शेष में निबंध संग्रह, आलोचना, उपन्यास, नाटक की किताबें शामल थीं।

द्वितीय  दिन
  • दूधनाथ सिंह बने अध्यक्ष , जुबैर कार्यकारी अध्यक्ष,  मुरली जलेस के महासचिव बने रहेंगे
  • सदस्यीय केंद्रीय परिषद में यूपी के प्रमुख लेखकों को स्थान

  • जनवादी लेखक संघ के सम्मेलन में आह्वान : धारदार लेखन से करें समय से संवाद

जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय परिषद के विभिन्न पदों का चुनाव हुआ। इसके अध्यक्ष पद पर वरिष्ठ कहानीकार दूधनाथ सिंह चुने गए। उन्होंने इस मौके पर लेखन को बरकरार रखते हुए वैचारिक धार बनाए रखने की जरूरत पर बल दिया। नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष  ने रचनाकारों से धारदार लेखन के साथ अपने समय से संवाद करने का आह्वान किया। कहा, लेखकों को रचनात्मक लेखन में मौजूदा समय की समस्याओं को धारदार तरीके से शामिल करना होगा। 
दूधनाथ सिंह ने कहा कि युवा लेखन हमेशा नवीन संदर्भों को लेकर आता है, इसलिए पुराने ढंग से सोचने वाले लेखकों के लिए एक आश्चर्यजनक धक्के जैसा है लेकिन नवीनता के वाहक नए लेखक ही होंगे। मैं खुले मन से उन नए लेखकों से नए प्रयोग और रचनात्मक पहल की उम्मीद करता हूं। भविष्य इन्हीं का है और संगठन भी इन्हीं का होगा। कहा कि इस धार से सत्ता, शासक एवं अन्य तत्वों से मोर्चा लेना ही हमारा प्रमुख उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि हमारा संगठन धक्के, शक, संदेह की गुंजाइश को कम करते हुए स्वीकृति को बढ़ावा देगा। लेखन और विचारों पर हमारी प्रतिबद्धता रचनात्मक होनी चाहिए और तमाम कोशिशों के बाद भी लेखन बरक़रार रहना चाहिए और केवल लेखन से भी पूरा नहीं पड़ेगा बल्कि परिवर्तन के लिए लेखन में वैचारिक धार के साथ सत्ता और शासक वर्ग के विरुद्द मोर्चा बनाने का काम सजग और रचनात्मक रूप से आगे बढ़ाना चाहिए | हमारा मूल लेखन ही हमारे रचनात्मक योगदान का साधन है, हम इसी के जरिये समाज को बदल सकते हैं | यह सम्मेलन हमारी लेखकीय प्रतिबद्दता और सामाजिक संघर्षों में एकजुटता को मज़बूत करेगा ऐसा मेरा विश्वास है |  हिंदी और उर्दू दोनों हिन्दुस्तानी का एक रूप हैं है, दोनों भाषाओँ का साहित्य और उनके तेवर हमारी प्रतिबद्दता का सबूत है |
मुक्तिबोध को याद करें तो -

कोशिश करो , कोशिश करो
जीने की
जमीन में गडकर भी |

इसके पूर्व चंचल चौहान ने केंद्रीय परिषद के पदाधिकारियों की घोषणा की जिसको संघ की केंद्रीय परिषद ने सर्व सम्मति से स्वीकार किया। दूधनाथ सिंह को अध्यक्ष, जुबैर रिजवी को कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। नवनिर्वाचित दस उपाध्यक्षों में चंचल चौहान, रमेश कुंतल मेघ, डा. मृणाल, इब्बार रब्बी, विजयेन्द्र, मुद्रा राक्षस, शेखर जोशी, अफ्फाक हुसैन, नमिता सिंह एवं चंद्रकला पांडेय शामिल रहे। मुरली मनोहर प्रसाद सिंह महासचिव बने रहेंगे। संजीव कुमार को नया उपमहासचिव नियुक्त किया गया। शुभा, मनमोहन, राजेश जोशी, प्रदीप सक्सेना, सुमिता लाहिड़ी, नीरज सिंह, राजेन्द्र शाहीवाल एवं रेखा अवस्थी को नया सचिव नियुक्त किया गया। सुधीर सिंह को नई कार्यकारिणी में चयनित किया गया।

141 सदस्यीय केंद्रीय परिषद में चुने गए उत्तर प्रदेश के प्रमुख लेखकों में नमिता सिंह, सुधीर सिंह, अनिल कुमार सिंह, विशाल श्रीवास्तव, केशव तिवारी, नलिन रंजन सिंह, संतोष चतुर्वेदी एवं उमाशंकर आदि प्रमुख हैं।  

चंचल चौहान ने केंद्रीय कार्यकारिणी की रिपोर्ट प्रस्तुत की। बाद में उन्होंने कहा, मौजूदा समय में साम्राज्यवाद का विरोध उस पुरजोर तरीके से नहीं हो पा रहा है। अंतरराष्ट्रीय पूंजी ने विशाल मध्यवर्ग खड़ा किया है जो क्रांतिकारी शक्तियों का विरोधी नहीं बल्कि मित्र है। इस दौरान संजीव कुमार ने पांच प्रस्ताव रखे, जिसे कई संशोधनों के बाद पारित कर दिया गया। इसमें दलित उत्पीड़न के विरोध सहित उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाए जाने, विकास निधियों का एक अंश शिक्षा, साहित्य एवं कला पर खर्च किए जाने, स्त्रियों के उत्पीड़न के विरोध जैसे प्रस्ताव शामिल थे।सत्रंत में सुधीर सिंह ने नए पदाधिकारियों का स्वागत करते हुए डेलीगेट्स का आभार ज्ञापित किया।


पुस्तकों का विमोचन
जलेस के राष्ट्रीय सम्मेलन में वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी और नमिता सिंह ने कथाकार नीलकांत की तीन पुस्तकों का विमोचन किया। इसमें ‘मटखन्ना’, ‘राहुल: शब्द और कर्म (सम्पादित)’, ‘सौंदर्यशास्त्र की पाश्चात्य परंपरा’, शामिल है। राजेश जोशी ने युवा कवयित्री वसुंधरा के कविता संग्रह ‘शब्द नहीं हैं’, का लोकार्पण किया।
हरियाणा ज्ञान विज्ञान समिति के कलाकारों नरेश, राजकुमार, भारत, प्रशांत, सतनाम, दीपक, राजेश, कुसुम, सुमन, मीनाक्षी ने गीत प्रस्तुत किया। जनवादी लेखक संघ के 8 वें राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान बेहद भावुक क्षण आया जबकि जलेस के संस्थापकों में से एक कथाकार मार्कण्डेय की पत्नी विद्यावती सिंह को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।

संयोजक सुधीर सिंह ने नए सदस्यों का स्वागत करते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया। सम्मेलन में  मौजूद तकरीबन दो सौ प्रतिनिधियों  में 17 महिलाएं भी शामिल थीं। इसमें वरिष्ठ कथाकार शेखर जोशी वरिष्ठतम तो बंगाल के राहुल झा कनिष्ठतम सदस्य रहे।

 

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साझा संस्कृति संगम : प्रभात पटनायक का उदघाटन आलेख ~ सम्पूर्ण पाठ

साझा संस्कृति संगम के उद्घाटन में प्रभात पटनायक  के आलेख का सम्पूर्ण पाठ

नवउदारवाद और सांप्रदायिक फ़ासीवाद का उभार ~ प्रभात पटनायक


जनतंत्र की वैधता के लिए अवाम के बीच इस यक़ीन की जरूरत पड़ती है कि वे जनतांत्रिक प्रक्रिया में शिरकत करके अपनी जि़दगी में बेहतरी ला सकते हैं। यह यक़ीन झूठा भी साबित हो सकता है, यह केवल एक भ्रांति भी हो सकता है। जब यह भ्रांति नही रहती तो लोग न केवल जनतंत्र के बारे में सर्वनिषेधवादी होने लगते हैं, बल्कि उन्हें यह भी लगने लगता है कि वे अपने इन प्रयत्नों से अपनी जिंदगी में बेहतरी नहीं ला सकते। इस तरह की हताशा उन्हें किसी ‘उद्धारक’ या ‘अवतारी पुरुष’’ की खोज की ओर ले जाती है जिसमें उन्हें बेहतर ज़िंदगी दे पाने की अभूतपूर्व ताक़त की झलक दिखायी देती हो और जो उनको बदहाली से उबार सके। अवाम तब ‘तर्कबुद्धि के पक्ष में’ नहीं रह जाते, वे अतर्क की दुनिया में विचरण करने लगते हैं।

वित्तीय पूंजी के वर्चस्व के ज़माने में ऐसे ‘उद्धारकों’ और ‘अवतारी पुरुषों’ को अजीबोग़रीब तरीक़े से उस कारपोरेट क्षेत्र के द्वारा गढ़ा जाता है या उछाला जाता है, या ऐसे मामलों में जहां वे अपने कारनामों से उठने लगते हैं, कारपोरेट वित्तीय पूंजी अपने नियंत्रण वाले मीडिया का इसके लिए इस्तेमाल करती है, उनका निज़ाम कारपोरेट निज़ाम का समानार्थी हो जाता है। फ़ासीवाद का बीज-बिंदु यही है। (मुसोलिनी ने, जैसा कि हमें याद यहां याद आ रहा है, लिखा था कि फ़ासीवाद को वास्तविक अर्थो में कॉरपोरेटवाद कहना समीचीन होगा क्योंकि इसमें राजसत्ता कॉरपोरेट सत्ता में विलीन हो जाती है) इस तरह अवाम के, जनतंत्र के माध्यम से अपनी ज़िंदगी बेहतर बनाने की प्रक्रिया में यक़ीन के ख़ात्मे से वे हालात पैदा होते हैं जिनमें फासीवाद फलता फूलता है।


इसकी मिसाल जर्मनी के ‘वेइमार रिपब्लिक’ में देखी जा सकती है। अवाम की नज़रों में ‘वेइमार रिपब्लिक’ की वैधता ख़त्म हो चुकी थी क्योंकि वर्सीलीज़ संधि के फलस्वरूप मित्र शक्तियों ने हर्जाने का जो बोझ अवाम पर डाला था जिसकी वजह से अवाम की बढ़ती हुई बदहाली दूर कर पाने में एक के बाद एक चुनाव से बनी सरकार कामयाब न हो पायी थी। जनतंत्र की वैधता से यक़ीन उठ जाना ही वह विशेष कारण बना जिसने अवाम को नाज़ीवाद के आकर्षण के जाल में फंसा लिया। ‘वेइमार रिपब्लिक’ की असफलता को कम से कम उस शांति संधि में तलाश तो किया जा सकता है (जिसके खि़लाफ़ अर्थशास्त्री केंस ने आवाज़ उठायी थी)। मगर आज ‘ग्लोबलाइजे़शन’ के इस ज़माने में उसी तरह अवाम के बीच राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से बेहतर ज़िंदगी जी पाने में यक़ीन का ख़ात्मा हो गया है, साथ ही इस यक़ीन के ख़ात्मे की जड़ें इसी व्यवस्था के भीतर हैं। नव-उदारवाद के तहत यह प्रवृत्ति उभरती है कि जनतांत्रिक सस्थाओं की शक्ति पर से विश्वास उठ जाये और इसी से जुड़ा हुआ अतर्क बुद्धि का और फ़ासीवाद का विकसित होना है।

इसी तथ्य को दूसरे तरीक़े से समझा जा सकता है: नव-उदारवाद राजनीति के क्षेत्र को ‘अंत’ यानी ‘क्लोज़र’ की ओर धकेलता है जहां लोगों के सामने राजनीतिक विकल्पों में आर्थिक नीतियों पर एकरूपता दिखायी देती है, इससे अवाम की जिंदगी के हालात में उनके द्वारा चुने गये विकल्प से बहुत ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। यह ‘अंत’ या क्लोज़र केवल ‘नज़रिये’ का मामला नहीं है। दार्शनिक हेगेल ने इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को प्रशियाई राजसत्ता के गठन के साथ आये अंत के रूप में देखा था। दर्शनशास्त्र में हेगेलवाद के विकास के समांतर ही अर्थशास्त्र में जो नया सिद्धांत विकसित हुआ, उसने भी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के उभार के साथ इतिहास के अंत की बात की थी। मगर ये सिर्फ ‘नज़रिये’ ही थे। इसके विपरीत, नव-उदारवाद एक साथ दो स्थितियां पैदा करता है, एक ओर वह एक वास्तविक मोड़ ले आता है जहां अवाम के सामने सचमुच का राजनीतिक विकल्प लाने के बजाय राजनीति के अंत की दशा या विकल्पहीनता होती है, इसकी प्रवृत्ति विकल्पों को एक जैसा बना देने की होती है जिससे अवाम के माली हालात में कोई सुधार नहीं होता। और यही वजह है कि अवाम की हताशा उन्हें अतार्किकता व फ़ासीवाद की ओर धकेलती है। मगर सवाल उठता है कि नवउदारवाद, ‘अंत’ का यह रुझान, क्यों उत्पन्न करता है? आइए, इस सवाल पर ग़ौर करें।

इसका जो सबसे अहम कारण है, उसे ज़्यादातर लोग जानते हैं, इसलिए इस पर यहां ज़्यादा बात करना ज़रूरी नहीं। ‘ग्लोबलाइजे़शन’ के साथ जुड़ा यह तथ्य है कि यह मालों व सेवाओं की पूरी दुनिया में आवाजाही की आज़ादी देता है, इन सबसे ऊपर, पूंजी की आवाजाही की आज़ादी है जिसमें वित्तीय पूंजी भी शामिल है। इस युग में जहां पूंजी तो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लेती है, देश उसी जगह राज्य-राष्ट्र बने रहते हैं। हर देश की आर्थिक नीतियां ‘निवेशकों का भरोसा’ बनाये रखने के विचार से नियंत्रित होती है, यानी भूमंडलीकृत पूंजी को फ़ायदा पहुंचना चाहिए, वरना वह पूंजी एकमुश्त उस देश को छोड़ कर कहीं और चली जायेगी, इस तरह वह देश बुरी तरह आर्थिक संकट की खंदक में जा गिरेगा। इस तरह के आर्थिक संकट में फंसने से बचने की ख़्वाहिश देश की तमाम राजनीतिक संरचनाओं को मजबूर करती है कि वे उसी एजेंडे को लागू करें जो भूमंडलीकृत पूंजी को मंजूर हो। यह तब तक चलता है जब तक कोई देश खुद ग्लोबलाइज़ेशन के दायरे में रहना जारी रखना चाहता है यानी वह पूंजी पर और व्यापार पर नियंत्रण लगाने की सोच कर भूमंडलीकरण की सीमा से बाहर जाने की कोशिश नहीं करता। इससे अवाम के सामने किसी सही विकल्प का चुनाव रह ही नहीं जाता। वे जिसे भी चुनें, जिस किसी की सरकार बने, वह घूम फिर कर उन्हीं ‘नवउदारवादी’ नीतियों पर चलती है।

हम यह अपने देश में भी देख रहे हैं। यूपीए सरकार और एनडीए सरकार और यहां तक कि ‘थर्ड फ्रंट’ की अल्पायु सरकार भी आर्थिक नीतियों के मामले में एक जैसी सरकारें ही रहीं। आज भी, जब चुनावी विकल्प के रूप में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी का शोरशराबा हो रहा है, आर्थिक नीतियों के स्तर पर शायद ही कोई बुनियादी फ़र्क़ हो। सचाई तो यह है कि मोदी खुद इस बात पर ज़ोर देता है कि उसमें ‘शासन करने’ की यू.पी.ए. के मुक़ाबले बेहतर क्षमता है, आर्थिक नीतियों के मामले में कोई बुनियादी अंतर नहीं जिनसे अवाम की बदहाली दूर हो सके। इससे यही साबित होता है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में अवाम के सामने आर्थिक नीतियों के स्तर पर वास्तविक विकल्प मौजूद नहीं है। इस बुनियादी तथ्य के अलावा इस युग में देश के वर्गीय ढांचे में कुछ ऐसे बदलाव आये हैं जिनकी वजह से भी विकल्प की ओर बढ़ पाने में दुश्वारी आ रही है। इन तब्दीलियों में एक बुनियादी तब्दीली यह है कि मज़दूरों और किसानों की शक्ति में कमी आयी है। चूंकि राज्यसत्ता की रीतिनीति तो वित्तीय पूंजी को खुश करने की है, इससे उसकी भूमिका बड़ी पूंजी के हमले से छोटे कारोबार और उत्पादन की रक्षा करना या मदद करना नहीं रह जाती। इस असुरक्षा के माहौल में छोटे उत्पादक, मसलन किसान, दस्तकार, मछुआरे, शिल्पी आदि और छोटे व्यापारी भी शोषण की मार झेलने के लिए छोड़ दिये जाते हैं। यह शोषण दोहरे तरीक़े से होता है, एक तो प्रत्यक्ष तौर पर बड़ी पूंजी उनकी संपदा जैसे उनकी ज़मीन वग़ैरह को कौडि़यों के मोल ख़रीद कर, दूसरे, उनकी आमदनी में गिरावट पैदा करके। इससे लघु उत्पादन के माध्यम से उनकी जि़ंदा बने रहने की क्षमता कम रह जाती है। अपनी आजीविका के साधनों से वंचित ये लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, इससे बेरोज़गारों की पांत और बढ़ती जाती है।

इसके साथ ही नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था में नये रोज़गार भी सीमित ही रहते हैं, भले ही आर्थिक विकास में तेज़ी दिखायी दे रही हो। उदाहरण के तौर पर, भारत में आर्थिक विकास की चरमावस्था में भी रोज़गार की विकास दर, 2004-5 और 2009-10 में नेशनल सेम्पल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक 0.8 प्रतिशत ही रही। जनसंख्या की वृद्धि दर 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही और इसे ही काम के लायक जनसंख्या की वास्तविक वृद्धि दर माना जा सकता है। इसमें उन लघु उत्पादकों को भी जोड़ लें जो अपनी आजीविका से वंचित हो जाते हैं और रोज़गार की तलाश में शहर आ जाते हैं तो बेरोज़गारी की विकास दर 1.5 प्रतिशत से ज़्यादा ही ठहरेगी। उसमें केवल 0.8 प्रतिशत को रोज़गार मिलता है। तो इसका मतलब यह है कि बेरोज़गारों की रिज़र्व फ़ौज की तादाद में भारी मात्रा में इज़ाफ़ा हो रहा है। इसका असर मज़दूर वर्ग की सौदेबाज़ी की ताक़त पर पड़ता है। वह ताक़त कम हो जाती है। इस तथ्य में एक सचाई और जुड़ जाती है, यानी बेरोज़गारों की सक्रिय फ़ौज और रिज़र्व फ़ौज के बीच की अंतर-रेखा का मिट जाना। हम अक्सर सक्रिय फ़ौज को पूरी तरह रोज़गारशुदा मान कर चलते हैं, रिज़र्व फ़ौज को पूरी तरह बेरोज़गार। मगर कल्पना करिए, 100 की कुल तादाद में से 90 को रोज़गारशुदा और 10 को बेरोज़गार मानने के बजाय, यह मानिए कि ये अपने समय के 9/10 वक़्त तक ही रोज़गार में हैं, इससे वह धुंधली अंतर-रेखा स्पष्ट हो जायेगी जिसे हम रोज़गार में ‘राशन-प्रणाली’’ या सीमित रोज़गार अवसर की प्रणाली के रूप में देख पायेंगे। दिहाड़ी मज़दूर की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, स्थायी और अस्थायी नौकरियों में लगे लोग, या खुद कभी कभी नये काम करने वाले लोग जो किसानों के पारंपरिक कामों से हट कर हैं, यही दर्शाते हैं कि रोज़गारों में सीमित अवसर ही उपलब्ध हैं। बेरोज़गारों की तादाद में बढ़ोतरी जहां मज़दूरों की स्थिति को कमज़ोर बनाती है। वहीं रोज़गारों के सीमित अवसर इन हालात को और अधिक जटिल बना रहे हैं।

‘रोज़गारों के सीमित होने के नियम’ में तब्दीली के अलावा रोज़गार पाने के नियम भी बदले हैं जिनके तहत स्थायी नौकरियों के बजाय ठेके पर काम कराने की प्रथा चल पड़ी है। हर जगह ‘आउटसोर्सिंग’ के माध्यम से बड़े ठेकदारों से काम लिया जाता है जो भाड़े पर वही काम कराते हैं जो पहले उस विभाग में स्थायी कर्मचारी करते थे ;रेल विभाग इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इससे भी मज़दूरों की सौदेबाज़ी की, यानी हड़ताल करने की क्षमता में कमी आयी है। दो अन्य तथ्य इसी दिशा का संकेत देते हैं। एक उद्योगों का निजीकरण जो कि भूमंडलीकरण के दौर में तीव्र गति हासिल कर रहा है। यूनियन सदस्यों के रूप में मज़दूरों का प्रतिशत पूरी पूंजीवादी दुनिया में प्राइवेट सेक्टर के मुक़ाबले पब्लिक सेक्टर में ज़्यादा है। अमेरिका में जहां प्राइवेट सेक्टर में केवल 8 प्रतिशत मज़दूर यूनियन सदस्य हैं, वहीं सरकारी क्षेत्र में, जिसमें अध्यापक भी शामिल हैं, कुल संख्या का एक तिहाई यूनियन सदस्य है। सरकारी क्षेत्र का निजीकरण इस तरह यूनियन सदस्यता में कमी लाता है और इस तरह मज़दूरों की हड़ताल करने की क्षमता कम होती जाती है। फ्रांस में पिछले दिनों कई बड़ी हड़तालें हुईं हैं तो इसकी एक वजह यह भी है कि सारे विकसित पूंजीवादी देशों के पब्लिक सेक्टरों के यूनियनबद्ध मज़दूरों की संख्या के मुक़ाबले फ्रांस में उनकी तादाद अभी भी सबसे ज़्यादा है।

एक और कारक भी है, जिसे ‘रोज़गार बाज़ार में लचीलापन’ कहते हैं, जिसके द्वारा मज़दूरों के एक सीमित हिस्से को ;फै़क्टरी में एक ख़ास संख्या के मज़दूरों से ज़्यादा रोजगारशुदा होने पर श्रम कानूनों के तहत जो सुरक्षा मिली हुई है; जैसे मज़दूरों को निकालने के लिए तयशुदा समय का नोटिस देना, उसे भी ख़त्म करने की कोशिश चल रही है। यह अभी भारत में नहीं हो पाया है,, हालांकि इसे लागू करवाने का दबाव बहुत ज़्यादा है। ‘रोज़गार बाज़ार में लचीलापन’ का यह दबाव कम अहम लग सकता है क्योंकि इसका असर सीमित मज़दूरों की तादाद पर ही दिखायी दे सकता है, मगर इसका मक़सद उन मज़दूरों से हड़ताल करने की क्षमता छीन लेना है जो अहम सेक्टरों की बड़ी बड़ी इकाइयों में काम कर रहे हैं और जिनकी हड़ताल क्षमता सबसे ज़्यादा है। ये तमाम तब्दीलियां यानी मज़दूरों की संरचना में, सौदेबाज़ी की उनकी क्षमता में, क़ानून के तहत मिले उनके अधिकारों में आयी तब्दीलियां मज़दूर वर्ग की राजनीति की ताक़त को कमज़ोर बनाने में अपनी भूमिका निभा रही हैं। ट्रेड यूनियनों के कमज़ोर पड़ने का असर स्वतः ही मजदूर वर्ग के राजनीतिक दबाव के कमज़ोर होने में घटित होता है, एक वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक समाधान आगे बढ़ाने की उसकी क्षमता भी कमज़ोर होती है, और उसके इर्द-गिर्द अवाम को लामबंद करने में दुश्वारियां आती हैं।  इस तरह कारपोरेट-वित्तीय पूंजी भूमंडलीकृत पूंजी से गठजोड़ करके जितनी ताक़तवर होती जाती है, उतनी ही मज़दूर वर्ग, किसान जनता और लघु-उत्पादकों की राजनीतिक ताक़त में कमज़ोरी आती है, वे ग़रीबी और ज़हालत की ओर धकेल दिये जाते हैं। भूमंडलीकरण का युग इस तरीके़ से वर्ग-शक्तियों के संतुलन में एक निर्णायक मोड़ ले आया है।

इस परिवर्तन के दो अहम नतीजे ग़ौर करने लायक़ हैं। पहला, वर्गीय राजनीति में गिरावट के साथ ‘पहचान की राजनीति’ वजूद में आती है। दरअसल, ‘पहचान की राजनीति’ एक भ्रामक अवधारणा है क्योंकि इसमें अनेक असमान, यहां तक एक दूसरे के एकदम विपरीत तरह के आंदोलन समाहित हैं। यहां तीन तरह के अलग अलग संघटकों की पहचान की जा सकती है। एक, ‘पहचान से जुडे़ प्रतिरोध आंदोलन’ जैसे दलित आंदोलन या महिला आंदोलन, जिनकी अपनी अपनी विशेषताएं भी हैं; दूसरे, ‘सौदेबाज़ी वाले पहचान आंदोलन’ जैसे जाटों की आरक्षण की मांग जिसकी आड़ में वे अपनी स्थिति मज़बूत बना सकें; तीसरे, ‘पहचान की फ़ासीवादी राजनीति’; जिसकी स्पष्ट मिसाल सांप्रदायिक फासीवाद है, जो हालांकि एक ख़ास ‘पहचान समूह’ से जुड़ी हुई है और दूसरे ‘पहचान समूहों’ के खि़लाफ़ ज़हरीला प्रचार करके उन पर हमला बोलती है। इस राजनीति को कॉरपोरेट वित्तीय पूंजी पालती पोसती है और इसका वास्तविक मक़सद उसी कॉरपोरेट जगत को मज़बूती प्रदान करना होता है, न कि उस पहचान समूह के हितों के लिए कुछ करना जिनके नाम पर वह राजनीति संगठित होती है।

जहां ये तीनों तरह की ‘पहचान राजनीतियां’ एक दूसरे से काफ़ी जुदा हैं, वर्गीय राजनीति में आयी कमज़ोरी का अहम असर उन सब पर है। इस तरह की राजनीति ऐसे किसी ख़ास पहचान समूह को ‘पहचान के नाम पर सौदेबा़जी की राजनीति’ के माध्यम से एक उछाल प्रदान करती है जो अपने वर्गीय संगठनों के तहत कोई असरदार काम नहीं कर सकते। इस राजनीति से ‘पहचान की फ़ासीवादी राजनीति’ को भी बल मिलता है क्योंकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजात का वर्चस्व इस तरह की राजनीति को बढ़ावा देता है। जहां तक ‘प्रतिरोध के पहचान आंदोलनों’ का सवाल है, वर्गीय राजनीति के चौतरफ़ा कमजोर पड़ने से उनमें भी प्रगतिशीलता का तत्व कमज़ोर हुआ है और इससे वे भी अधिक से अधिक ‘सौदेबाज़ी की पहचान राजनीति’ की ओर धकेल दिये गये हैं। कुल मिलाकर, वर्गीय राजनीति में गिरावट से ‘पहचान की राजनीति’ के ऐसे रूपों को मज़बूती हासिल हुई है जो व्यवस्था के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करते बल्कि उल्टे, अवाम के एक हिस्से को दूसरे के खि़लाफ़ खड़ा करके इस व्यवस्था के लिए किसी आसन्न ख़तरे की संभावना को कमज़ोर ही करते हैं। इससे उस नयी संरचना के विचार को आघात पहुंच रहा है जिसमें, देश के भीतर जाति आधारित सामंती व्यवस्था के तहत ‘पुरानी व्यवस्था’ को ढहा कर, उसकी जगह ‘नयी सामुदायिक व्यवस्था’ की स्थापना पर बल था, जो कि हमारे जनतंत्र की मांग है।

इस आघात का एक और पहलू है, जो इस समाज के लंपटीकरण से जुड़ा है। पूंजीवादी समाज की यह ख़ासियत है कि इसकी सामाजिक स्वीकार्यता इस व्यवस्था के तर्क से उद्भूत नहीं होती, बल्कि तर्क के बावजूद होती है। ऐसी दुनिया जिसमें मज़दूर अपनी तरह तरह की गुज़र बसर की जगहें छोड कर एक जगह ठूंस दिये जाते हैं, जहां वे अकेले अकेले पड़ जाते हैं, एक दूसरे के साथ बुरी तरह प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, जैसी कि पूंजीवाद के तर्क की मांग है, वह दुनिया सामाजिक रूप से असुरक्षा से घिरी दुनिया ही होगी ;जिसे शायद ही ‘समाज’ की संज्ञा दी जा सके। पूंजीवाद के तहत सामाजिक वजूद इसलिए संभव होता है क्योंकि इसके नियमों के विपरीत मज़दूर शुरू में एक दूसरे से अनजान होते हैं, बाद में वे अपने ‘समूह’ बना लेते हैं जो कि ट्रेड यूनियनों के माध्यम से वर्गीय संगठनों में विकसित हो जाते हैं। यही वह ‘नया सामुदायिक समाज’ हो सकता है जिसका अभी हमने जि़क्र किया है।

अतीत में पूंजीवाद के तहत इस तरह के समाज का विकास संभव हुआ था क्योंकि बड़े पैमाने पर आबादी के बड़े शहरों में आ जाने से और नयी अनुकूल श्वेत बस्तियों में बस जाने से स्थानीय कामगारों की फ़ौज के रूप में उनकी तादाद सीमित रही और ट्रेड यूनियनें शक्तिशाली हो गयीं। आज तीसरी दुनिया के मज़दूरों के लिए इस तरह की संभावनाएं मौजूद नहीं हैं, और नव-उदारवाद ने, जैसा कि हम देख रहे हैं, बेरोज़गारों की तादाद बढ़ा दी है, जबकि ट्रेड यूनियनों और मज़दूरवर्ग की सामूहिक संस्थाओं को कमज़ोर कर दिया है। अलग थलग पड़ जाने से लंपट सर्वहारावर्ग की वृद्धि हो रही है। आपसी सामाजिक रिश्तों में लगातार गिरावट या उनकी नामौजूदगी उन मेहनतकशों को, जो भिन्न प्रकार के रहन सहन के हालात से निकल कर आते हैं, लंपटीकरण की ओर धकेल देती है। यह एक सच्चाई है कि इस तरह का लंपटीकरण सारे पूंजीवादी समाजों में मौजूद है, मगर उन पर विकसित समाजों के मज़दूर वर्ग के सामूहिक संस्थानों का नियंत्रण रहता है, जो कि इधर नव-उदारवादी निज़ाम में ढीला भी हो रहा है, मगर तीसरी दुनिया के समाजों में तो उन संस्थानों का नियंत्रण बेअसर हो रहा है जो कि नव-उदारवाद की भयंकर चपेट में आ गये हैं। भारत में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में इधर जो बढ़ोतरी हो रही है, इस घटना विकास के बारे में मेरे नज़रिये से मेल खाती है।

नवउदारवाद के युग में मजदूर वर्ग को संगठित करने में आने वाली कठिनाइयों का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि मारुति फ़ैक्टरी में, जो कि दिल्ली राजधानी क्षेत्र के इलाके़ में ही क़ायम है, अगर कोई मज़दूर किसी ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता से बात करता हुआ या किसी पर्चे के साथ पकड़ा गया तो वह नौकरी से मुअत्तिल हो सकता है। नव-उदारवादी व्यवस्था का एक और बिंदु है जिसकी ओर मैं ध्यान दिलाना चाहूंगा। इसका संबंध ‘भ्रष्टाचार’ से है। इस तरह की अर्थव्यवस्था की ख़ासियत यह है कि इसमें बड़ी पूंजी में लघु उत्पादकों के शोषण का रुझान होता है। मगर लघु संपति उसका एकमात्र निशाना नहीं होती। उसकी प्रवृत्ति तो मुफ़्त में या कम क़ीमत पर आम संपत्ति हड़प लेने की होती है जिसमें सिर्फ़ लघु उत्पादकों की संपत्ति ही नहीं, आम संपत्ति, आदिवासियों की संपत्ति और राज्य की संपत्ति शामिल है। नव-उदारवाद का युग उस प्रक्रिया को घटित होते हुए देख रहा है जिसमें पूरी निर्ममता से ‘पूंजीसंचय की आदिम प्रक्रिया’ चल रही है जिसके लिए राज्य तंत्र की ओर से सहमति या साझेदारी ज़रूरी होती है। ऐसी सहमति प्राप्त कर ली जाती है जिसके लिए भूमंडलीकरण के ज़माने में हर राष्ट्र-राज्य पर नीतिगत मामलों का दबाव बना हुआ है, उस सहमति के लिए जो भी क़ीमत अदा करनी होती है, वह दे दी जाती है और उसी को हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं।

हम जिसे ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं, वह असल में एक तरह का टैक्स है जिसे राज्य तंत्र वसूल करता है जिसमें ‘राजनीतिक वर्ग’ भी सबसे बड़े हिस्से के रूप में शामिल होता है। यह टैक्स बड़ी पूंजी के द्वारा ‘पूंजीसंचय की आदिम प्रक्रिया’ से अर्जित लाभ पर वसूला जाता है। यह ग़ौरतलब है कि ‘भ्रष्टाचार’ के बड़े -बड़े मामले जो भारत में इधर प्रकाश में आये हैं, जैसे टू-जी स्पेक्ट्रम या कोयला ब्लाकों की औने पौने दामों पर आवंटन की प्रक्रिया आदि, उन्हें बेचने का फ़ैसला लेने वालों को बदले में जो धन मिला उसे हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं। इस तरह ‘पूंजी संचय की आदिम प्रक्रिया’ पर यह एक तरह का टैक्स है और इस प्रक्रिया में इधर जो तेज़ी दिखायी देती है, उसके मूल में नवउदारवादी दौर में पूंजी संचय की आदिम प्रक्रिया का बड़े पैमाने पर मौजूद होना ही है। ‘भ्रष्टाचार’ के रूप में इस तरह के टैक्स के स्वरूप को दो कारकों के संदर्भ से ख़ासतौर पर देखा जा सकता है। पहला कारक है, राजनीति का माल में तब्दील हो जाना। यह सच है कि भिन्न भिन्न राजनीतिक संरचनाएं जो नव-उदारवादी निज़ाम के तहत काम कर रही हैं, अलग अलग आर्थिक एजेंडा नहीं रख सकतीं, तो उनमें अवाम की सहमति किसी नये तरीके़ से लेने की होड़ रहती है। इसके लिए ख़ास कि़स्म से अपनी ‘मार्केटिंग’ के लिए, प्रचार करने वाली भाड़े की फ़र्मों का सहारा लेना पड़ता है और उन्हें मीडिया को ‘कैश दे कर ख़बर बनवाने’ का उपक्रम करना पड़ता है, हेलीकाप्टर भाड़े पर ले कर ज़्यादा से ज़्यादा जगहों की यात्रा करनी होती है जिससे अपनी सूरत ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को नज़र आ सके, वगै़रह वगै़रह। ये सारे काम बहुत ज़्यादा ख़र्चीले हैं जिसकी वजह से राजनीति को संसाधन जुटाने का काम करना पड़ता है, राजनीतिक पार्टियां किसी भी तरह संसाधन जुटाती ही हैं।

इसके अलावा, ‘राजनीतिक वर्ग’ को काम चलाने के लिए संसाधन जुटाने पड़ते हैं, मगर फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में उसकी भूमिका बहुत अहम नहीं रह जाती। विश्व बैंक और आइ एम एफ़ के अधिकारी रह चुके अफ़सर या बहुराष्ट्रीय बैंको और वित्तीय संस्थानों के आला अफ़सर अर्थव्यवस्था चलाने के लिए तेज़ी से नियुक्त किये जा रहे हैं, यानी ‘ग्लोबल वित्तीय समुदाय’ के लोग ही सरकारों के फ़ैसलाकुन पदों पर बिठाये जाते हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को पारंपरिक राजनीतिक वर्ग के हाथों में अर्थ नीति संबंधी फैसले लेने का दायित्व सौंपना सहन नहीं। पारंपरिक राजनीतिक वर्ग को इस पर गुस्सा आना स्वाभाविक है, मगर वह इससे कुछ हासिल कर लेता है तो उसे समझौता करने से कोई गुरेज भी नहीं। और यह ‘कुछ’ पूंजी के आदिम संचयन के लाभ में से मिलने वाले अंश या टैक्स के रूप में होता है जिसे हम ‘भ्रष्टाचार’ कहते हैं और उसकी ज़रूरत इसलिए भी पड़ती है क्योंकि राजनीति माल में तब्दील हो चुकी है।

‘भ्रष्टाचार’ इस तरह नव-उदारवादी ऩिजाम में बहुत सक्रिय भूमिका अदा करता है। यह ‘राजनीतिक वर्ग’ में अचानक आये ‘नैतिक’ पतन का परिणाम नहीं है, यह नव-उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था का अपरिहार्य हिस्सा है। ‘भ्रष्टाचार’ का जो असर नव-उदारवादी पूंजीवाद पैदा करता है, उससे कॉरपोरेट वित्तीय अभिजात को एक दूसरी वजह से फ़ायदा होता है। यह ‘राजनीतिक वर्ग’ को बदनाम करके छोड़ता है, वह संसद को और जनतंत्र के दूसरे प्रातिनिधिक संस्थानों को कलंकित करा देता है, और साथ ही, अपने नियंत्रण वाले संचारमाध्यमों के फ़ोकस द्वारा चालाकी से यह सुनिश्चित कर लेता है कि ‘भ्रष्टाचार’ के इन कारनामों से पैदा हुए नैतिक कलंक की कालिख उसके काम में बाधा न बने। ‘भ्रष्टाचार’ विमर्श इसके रास्ते में आने वाले रोड़ों को साफ़ करते हुए कॉरपोरेट निज़ाम के युग की शुरुआत आसान बना देता है।

बात दरअसल और आगे जाती है। हमने देखा है कि नव-उदारवाद का दौर बेरोज़गारी के सापेक्ष आकार को बढ़ाता है, जिसके चलते वह निरपेक्ष दरिद्रता की शिकार आबादी के सापेक्ष आकार में भी बढ़ोत्तरी करता है। छोटे उत्पादक- चाहे वे अपने पारंपरिक व्यवसाय में लगे रहें या रोज़गार के अवसर की तलाष में शहरी इलाक़ों, जहां ऐसे अवसर आवश्यकता से कम ही हैं, की ओर चले जाएं- उनका निरपेक्ष जीवन-स्तर और बदतर हो जाता है। कामगारों की तादाद में जो नया इज़ाफ़ा होता है, उसे बढ़ती बेरोज़गारी के कारण अपने पुरखों के मुक़ाबले व्यक्तिगत स्तर पर बदतर भौतिक जीवन-स्थितियां झेलनी पड़ती हैं। और वे कामगार भी, जो बाक़ायदा रोज़गार पा लेते हैं, श्रम की रिज़र्व फ़ौज के बढ़ते सापेक्ष आकार द्वारा थोपी गयी आपसी होड़ की वजह से उदारीकरण से पहले के दौर का वास्तविक वेतन-स्तर हासिल नहीं कर पाते। कामगार आबादी के न सिर्फ़ बड़े, बल्कि बढ़ते हुए हिस्से को प्रभावित करती भयावह ग़रीबी आम बात हो जाती है।

यह ऐसा नुक्ता  है जिसे उत्सा पटनायक लंबे समय से सामने लाती रही हैं। नेशनल सेंपल सर्वे के आंकड़ों पर आधारित उनके निष्कर्ष बताते हैं कि 2100 कैलोरी प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन (‘शहरी ग़रीबी’ के लिए आधिकारिक सीमा रेखा) से कम पाने वाली शहरी आबादी 1993-94 में जहां 57 फ़ीसद थी, वहीं 2004-5 में वह बढ़ कर 64.5 फ़ीसद हो गयी और 2009-10 में 73 फ़ीसद हो गयी। 2200 कैलारी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (‘ग्रामीण ग़रीबी’ के लिए आधिकारिक सीमा रेखा) से कम पाने वाली ग्रामीण आबादी इन्हीं वर्षों में क्रमशः 58.5, 69.5 और 76 फ़ीसद थी। यह ग़ौरतलब है कि उच्च जीडीपी बढ़ोत्तरी के दौर में, जिसके भीतर 2004-5 से 2009-10 तक के साल आते हैं, ग़रीबी में ज़बर्दस्त बढ़त हुई। संक्षेप में, नव-उदारवाद के तहत ग़रीबी में बढ़ोत्तरी एक ऐसी व्यवस्थागत परिघटना है जिसकी जड़ें इस तरह के अर्थतंत्र की फि़तरत का ही हिस्सा हैं; जी.डी.पी. की ऊंची बढ़ोत्तरी से ग़रीबी दूर हो, यह ज़रूरी नहीं।

लेकिन कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन और उसके द्वारा नियंत्रित मीडिया जिस विमर्श को बढ़ावा देता है, वह ‘भ्रष्टाचार’ को जनता की आर्थिक बदहाली का, और इसीलिए बढ़ती ग़रीबी का, कारण बताता है। इस तरह नवउदारवाद के व्यवस्थागत रुझान का दोश मुख्य किरदार निभाने वाले कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन के सर नहीं मढ़ा जाता, बल्कि ‘राजनीतिक वर्ग’ और संसद समेत उन तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं के मत्थे मढ़ दिया जाता है जहां यह राजनीतिक वर्ग मौजूद होता है। इस तरह जनता को मुसीबत में झोंकने का व्यवस्था का अंतर्निहित रुझान विडंबनापूर्ण तरीक़े से जनता की निगाह में व्यवस्था को एक सहारा देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, उसी कॉरपोरेट पूंजी के शासन को वैधता देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो इस काम में मुख्य किरदार निभा रहा होता है।

यह बात संकट के ऐसे दौर में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जैसे दौर से इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था गुज़र रही है। ऊंची बढ़त का दौर निकल गया है, जो कि कतई हैरतअंगेज़ नहीं; हिंदुस्तान में ऊंची बढ़त का चरण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ‘बुलबुले’ के मेल पर क़ायम था। इस ‘बुलबुले’ को देर-सबेर फूटना ही था। पहला वाला 2008 में फूटा, और दूसरा कुछ साल बाद। इस संकट का मतलब है कि रोज़गार की वृद्धि दर में और कमी आ रही है, जिससे कि कामगार जनता जो बढ़त के समय भी पीसी जा रही थी, उसकी हालत तो और ख़राब हो ही रही है, वह शहरी मध्यवर्ग जो बढ़त का महत्वपूर्ण लाभार्थी था, उसकी भी हालत ख़राब हो रही है। लेकिन कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन की देखरेख में ‘राजनीतिक वर्ग’ के खि़लाफ़ खड़ा किया गया विमर्श न सिर्फ़ जनता के गुस्से को आर्थिक व्यवस्था और संसद समेत लोकतांत्रिक संस्थाओं के खि़लाफ़ जाने से रोकता है, बल्कि यह समझ भी बनाता है कि आज ज़रूरत एक अधिक ‘ताक़तवर’, अधिक निर्मम नव-उदारवाद की है। और यह चीज़ ‘भ्रष्टाचार’ में लिप्त ‘राजनीतिक वर्ग’ मुहैया नहीं करा सकता, जबकि कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन और ‘विकास पुरुष’ के रूप में पेश किए जा रहे नरेंद्र मोदी जैसे उसके भरोसेमंद राजनीतिक एजेंट करा सकते हैं। इस तरह कॉरपोरेट शासन यानी फ़ासीवाद के लिए राह हमवार की गई है। कहने की ज़रूरत नहीं कि फ़ासीवाद की ओर संक्रमण को किसी एकल कड़ी के रूप में, एक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जो किसी विशेष व्यक्ति के सत्ता में आने से घटित होती है। इस मामले में हमें 1930 के दशक की सोच में नहीं फंसना चाहिए। आज के हिंदुस्तान में तो पहले से ही ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, मिसाल के लिए उत्तरप्रदेश, जहां ‘आतंकवादी’ होने के संदेह पर ही किसी मुसलमान युवक को गिरफ़्तार किया जा सकता है और बिना सुनवाई, बिना जमानत के सालों-साल जेल में रखा जा सकता है। उसे क़ानूनी मदद भी नहीं मिल सकती क्योंकि वक़ील आम तौर पर किसी ‘आतंकवादी’ की पैरवी करने से इंकार कर देते हैं; और वे वक़ील, जो क़ानूनी मदद पहुंचाने की हिम्मत रखते हैं, सांप्रदायिक-फ़ासीवादी ताक़तों के हाथों हिंसा झेलते हैं। अगर आरोपित की खुशकि़स्मत से एकाध दशक के बाद सुनवाई पूरी हो जाए और कि़स्मत ज़्यादा अच्छी हुई तो समुचित क़ानूनी बचाव के बग़ैर भी निर्दोष क़रार दिया जाए, तब भी जनता की निगाह में एक ‘आतंकवादी’ होने का कलंक उस पर लगा ही रहता है और उसे नौकरी नहीं मिलती; और जिन लोगों ने उसे गिरफ़्तार करके जेल में अपनी जि़ंदगी के बहुमूल्य वर्ष बिताने के लिए मजबूर किया, उन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती।

इसी तरह, दिल्ली के पास मारुति कारख़ाने के सौ से ज़्यादा मज़दूर महीनों से बिना किसी सुनवाई के, बिना ज़मानत या पैरोल के, जेल में बंद हैं। उन पर एक व्यक्ति की हत्या का संदेह है (जिसकी हत्या करने का कोई कारण सीधे-सीधे नज़र नहीं आता) और इसे लेकर कोई समुचित जांच अभी तक नहीं हुई है। यह स्थिति, जिसे मैं ‘मोज़ाइक फ़ासीवाद’ की स्थिति कहता हूं, इस मुल्क में पहले से मौजूद है। अगर कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन द्वारा समर्थित सांप्रदायिक-फ़ासीवादी तत्व अगले चुनाव के बाद सत्ता में आते हैं तो उन्हें लंपट तत्वों के बाहुबल पर फलते-फूलते स्थानीय सत्ता-केंद्रों की मदद पर निर्भर रहना होगा, जैसा कि अभी पश्चिम बंगाल में देखने को मिलता है। ये स्थानीय सत्ता-केंद्र कॉरपोरेट-वित्तीय अभिजन से सीधे-सीधे जुड़े नहीं हैं और इसीलिए सीधे-सीधे इन्हें फ़ासीवादी नहीं कहा जा सकता; पर वे शिखर पर एक फ़ासीवादी व्यवस्था को बनाये रखने में मददगार हो सकते हैं। दूसरे शब्दों में, देश  ‘मोज़ाइक फ़ासीवाद’ से ‘फ़ेडरेटेट फ़ासीवाद’ की ओर बढ़ सकता है और ज़रूरी नहीं कि एक एकल एपीसोड के रूप में एकीकृत फ़ासीवाद का तजुर्बा हो।

इनमें से कोई बात इस पर्चे की बुनियादी बात को बदलती नहीं है। वह बात यह कि नवउदारवाद से पैदा हुआ ‘राजनीति का अंत’ फ़ासीवाद की ओर संक्रमण की ज़मीन तैयार करता है और यह संक्रमण उस तरह के संकट के दौर में तेज़ी पकड़ लेता है जिस तरह के संकट से हम आज गुज़र रहे हैं। स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि इन हालात में प्रगतिशील ताक़तें क्या कर सकती हैं? हेगेलीय दर्शन से उलट और इतिहास का अंत वाले अंग्रेजी राजनीतिक अर्थशास्त्र से उलट, मार्क्स ने सर्वहारा को बदलाव के एजेंट के रूप में देखा था जो सिर्फ़ इतिहास को आगे नहीं ले जाता बल्कि खुद ‘इतिहास के फंदे’ से मानव जाति के निकलने की सूरत भी बनाता है।

यह बुनियादी विश्लेषण आज भी वैध है, और हमारी गतिविधियों को इससे निर्देशित होना चाहिए, बावजूद इसके कि नवउदारवाद ने वर्गीय राजनीति को कमज़ोर किया है। लेकिन इस कमज़ोरी को देखते हुए ज़रूरत इस बात की है कि न सिर्फ़ मज़दूरों को संगठित करने के लिए नये क्षेत्रों की ओर बढ़ा जाये, मसलन अब तक असंगठित रहे मज़दूरों और घरेलू कामगारों को संगठित करना, बल्कि वर्गीय राजनीति के लिए नये कि़स्म के हस्तक्षेप भी किये जायें।


वर्गीय राजनीति को अधिक सोद्देश्य तरीक़े से ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ में हस्तक्षेप करना चाहिए, और उसे महज़ पहचान की राजनीति से ऊपर उठाना चाहिए। इसे अधिक सोद्देश्य विधि से दलितों, मुसलमानों, आदिवासी आबादी और महिलाओं के प्रतिरोध को संगठित करना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर एक पहचान समूह को किसी दूसरे की क़ीमत पर राहत मुहैया करायी गयी है तो दूसरे को भी बोझ की ऐसी सिरबदली के खि़लाफ़ प्रतिरोध के लिए संगठित किया जाए। वर्गीय राजनीति और ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ का अंतर, दूसरे शब्दों में, इस बात में निहित नहीं है कि इनके हस्तक्षेप के बिंदु अलग-अलग हैं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि वर्गीय राजनीति ‘पहचान की प्रतिरोध राजनीति’ के मुद्दों पर भी अपने हस्तक्षेप को स्वयं ‘पहचान समूह’ से परे ले जाती है। अलग तरह से कहें तो जातिसंबंधी या स्त्री के उत्पीड़न के मुद्दों पर हस्तक्षेप करने में विफलता स्वयं वर्गीय राजनीति की विफलता है, वर्गीय राजनीति का लक्षण नहीं।

इसी तरह, वर्गीय राजनीति को एक वैकल्पिक कार्यसूची के सवाल को खुद संबोधित करना चाहिए। इसे व्यवस्था के खि़लाफ़ संघर्ष में, एक ‘संक्रमणकालीन मांग’ के तौर पर, जनता के ‘अधिकार’ के रूप में बदहाली को रोकने वाले उपायों के सांस्थानीकरण पर ख़ास तौर से फ़ोकस करना चाहिए। मिसाल के लिए, इसे सार्वभौमिक अधिकारों के एक समूह- जैसे खाद्य अधिकार, रोज़गार का अधिकार, मुफ़्त स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार, एक ख़ास स्तर तक मुफ़्त गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, और एक सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए वृद्धावस्था पेंशन तथा विकलांगता मदद का अधिकार- के सांस्थानीकरण के लिए अभियान चलाना चाहिए और अवसर मिलने पर इन्हें अमल में लाना चाहिए।


यह सब पहली नज़र में महज़ एन.जी.ओ. की कार्यसूची जैसा लग सकता है जिसका वर्गीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। लेकिन वर्गीय राजनीति और पहचान की राजनीति या एन.जी.ओ. राजनीति के बीच बुनियादी अंतर मुद्दों को लेकर उतना नहीं है जितना इन मुद्दों को बरतने के पीछे निहित ज्ञानमीमांसा में है। वर्गीय राजनीति जब मुद्दों को उठाती है तो व्यवस्था के अतिक्रमण के ज़रिये ही उनके समाधान की संभावना को देखती है; और यह तथ्य उसे बाधित करने के बजाय ऐसे मुद्दों को उठाने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर एन.जी.ओ. राजनीति सिर्फ़ ऐसे मुद्दों को उठाती है, या मुद्दों को उसी हद तक उठाती है, जहां वे व्यवस्था के भीतर हल होने के लायक़ हों। वस्तुतः इस पर्चे का मुख्य बल इसी रूप में वर्गीय राजनीति संबंधी नज़रिये को बदलने पर है।

यह तर्क, कि मुल्क के पास इन अधिकारों की मांग को पूरा करने के लिए संसाधन नहीं हैं, ठीक नहीं है। इनके लिए कुल घरेलू उत्पाद का लगभग 10 फ़ीसदी ही दरकार होगा; और भारत जैसे मुल्क में, जहां अमीरों से बहुत कम टैक्स वसूला जाता है, वहां इस काम के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। इसके मुमकिन होने में सबसे बड़ी बाधा नवउदारवादी शासन है, और ठीक इसी वजह से वामपंथ को बामक़सद इस मामले को उठाना चाहिए। जहां भी वाम ताक़तें सत्ता में आती हैं, उन्हें संसाधनों को जुटाने के लिए जिस हद तक जाना मुमकिन हो, जाना चाहिए।

सबसे अधिक जिस चीज़ की ज़रूरत है, वह है नवउदारवाद के वैचारिक वर्चस्व को स्वीकार न करना। लोकतंत्र पर नवउदारवाद के हमले को रोकने और लोकतंत्र की हिफ़ाज़त से आगे समाजवाद के संघर्ष तक जाने के लिए नवउदारवादी वर्चस्व को नकारना और नवउदारवादी विचारों के खि़लाफ़ प्रति-वर्चस्व गढ़ने का प्रयास करना एक शर्त है। विचारों के इस संघर्ष में लेखकों की भूमिका केंद्रीय है।

(हूबहू जैसा कहा ....... )


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साझा संस्कृति संगम : स्वीकृत इलाहाबाद घोषणा

दिनांक 14 फरवरी 2014 को आयोजित साझा संस्कृति संगम में स्वीकृत इलाहाबाद घोषणा
(हूबहू जैसा कि प्राप्त हुआ )
साझा संस्कृति संगम में स्वीकृत 'इलाहाबाद घोषणा'

भारतीय समाज इस समय फ़ासीवाद के मुहाने पर खड़ा है। सच तो यह है कि देश के अनेक हिस्सों में लोग अघोषित फ़ासीवाद की परिस्थिति में ही सांस ले रहे हैं। यह ख़तरा काफ़ी समय से मंडरा रहा था पर अब एक अलग कि़स्म के और ज्यादा निर्णायक चरण में दाखि़ल होना चाहता है। साम्राजयी  सरमाया के दबाव में थोपे गये आर्थिक उदारीकरण ने बेतहाशा आर्थिक तबाही के साथ देश की संवैधानिक संरचना, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और सामाजिक और सांस्कृतिक परस्परता के ढांचे को ध्वस्त करना शुरू किया, और ऐसी हालत आन पहुंची है कि प्रतिक्रियावाद के ये बहुमुखी आक्रमण रोके नहीं गये तो हिंदुस्तानी मुश्तरक़ा तहज़ीब, जीवन शैली और पिछले डेढ़ सौ सालों में विकसित राजनीतिक पहचान और क़ौमी परंपराएं ही लापता हो जायेंगी। संगठित पूंजी ने राज्य और राजकीय संस्थाओं पर, प्रमुख राजनीतिक दलों में, कार्यपालिका, सुरक्षातंत्र और न्यायपालिका पर अपनी घुसपैठ इतनी बढ़ा ली है कि वह लगभग सभी दूरगामी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक नीतियों की दिशा निर्धारित करने लगी है और हुक्मरान तबक़ा इसके अर्दली की तरह काम करता दिखायी देता है। मीडिया के बड़े हिस्से पर पूंजी का क़ब्ज़ा हो चुका है। सूचना, प्रचार, समाचार और मनोरंजन के साधनों पर वह लगभग एकाधिकार की स्थिति में है। कानून, व्यवस्था और सुरक्षा के तंत्र अब पूंजी के चौकस प्रहरी, उसकी साजि़शों के प्रभावी वाहक और जन-हितों को कुचलने वाली हिंसक मशीन में बदल चुके हैं।

यह परिस्थिति सिर्फ़ अमरीकी दबाव या कारपोरेट घरानों के इशारे भर से नहीं बनी है; इसके पीछे प्रतिक्रियावादी ताक़तों द्वारा तालमेल के साथ भारतीय मध्यवर्ग और आम जनता के बहुत से हिस्सों की लामबंदी के संगठित प्रयास हैं और इन प्रयासों का एक लंबा इतिहास है। हमारे देश में भी फ़ासीवादी विचारधारा का एक अतीत है, वह अरसे से ताक़त इकट्ठा करती आ रही है अब वह नाजु़क हालत आ पहुंची है कि यह हमारे भविष्य को निर्धारित करना चाहती है। पिछले दो दशकों में शासक वर्ग की अवाम दुश्मन और लुटेरी नीतियों के नतीजे के तौर पर आनन फानन में धनी हुए मध्यवर्ग का एक बड़ा टुकड़ा, जिसमें नौकरीपेशा लोग भी शामिल हैं, अब इस पूंजी के पीछे लामबंद है। दूसरी तरफ़ दक्षिणपंथी, फि़रक़ावाराना और मज़हबी जुनून फैलाने वाली कुव्वतें, ख़ासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे सम्बद्ध दर्जनों संगठन हिंदुत्ववादी अस्मिता के निर्माण, प्रचार-प्रसार, योजनाबद्ध साजि़शों और आतंकवादी तरीक़ों से भारतीय समाज के प्रतिक्रियावादी पुनर्गठन में मुब्तिला हैं। इसी दौर में राष्ट्रीय आंदोलन की उदारवादी और जनोन्मुखी प्रेरणाएं और मूल्य तेज़ी से टूटे बिखरे हैं और बांये बाजू़ की वैकल्पिक चुनौती और प्रतिरोध की परंपरा भी कमज़ोर पड़ी है। संक्षेप में, सामराजी भूमंडलीकरण, कारपोरेट पूंजी और हिंदू राष्ट्रवाद का यह गठजोड़ हमारे राष्ट्रीय जीवन के हर हिस्से पर क़ाबिज़ होना चाहता है, और ऐसी हालत बनायी जा रही है कि लोगों को लगे कि अब और कोई विकल्प बचा नहीं है। जबकि सच यह है कि ऐन इसी समय समाज के बड़े हिस्से, ख़ासतौर पर वंचित तबके़ अपनी कशमकश और अपने संगठित-असंगठित निरंतर संघर्षों से बार-बार और तरह-तरह से जनवाद के विस्तार की तीव्र और मूलगामी आकांक्षा का संकेत दे रहे हैं। विश्वविजय के अभियान को पूरा कर चुका पूंजीवाद अभी गंभीर संकट में है और अपनी विध्वंसक मुहिम को बढ़ाने के अलावा उसे कोई विकल्प दिखायी नहीं देता। दुनिया भर में उसके खि्लाफ़ व्यापक जनअसंतोष की तीव्र अभिव्यक्ति स्वत:स्फूर्त और संगठित संघर्षों के रूप में सामने आ रही है, जिसे कुचलने या विकृत करने या दिशाहीन बनाने या अराजकता की ओर ले जाने की कोशिशें भी बड़े पैमाने पर चल रही हैं। मौजूदा फ़ासीवादी उभार इसी चुनौती का मुक़ाबला करने का मंसूबा लेकर सामने आया है। लोकतांत्रिक और वामपंथी ताक़तें इस समय एक अलगाव के हालात के बीच कॉरपोरेट फ़ासीवाद के भारी दबाव और हमलों का सामना कर रही हैं। यह एक विडंबना है कि जिस समय ऐसी ताक़तों की पारस्परिकता और विशाल एकजुटता की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, वे काफ़ी कुछ बिखराव की शिकार हैं।

हमने देखा है कि हर प्रकार की तानाशाही - फि़रक़ावाराना हो या किसी और तरह की - जनाधार ढूंढ़ती है और ख़ास हालात में वह उसे हासिल भी कर लेती है। जर्मनी और इटली की मिसालें लंबे समय से हमारे सामने हैं। भारतीय समाज की सामाजिक बनावट, विचारधारात्मक तंत्र और दैनिक सांस्कृतिक जीवन में निरंकुशतावादी या फ़ासीवादी तत्वों की मौजूदगी और सक्रियता का इतिहास बहुत पुराना है। पिछले बीस-तीस वर्षों में इस प्रतिक्रियावादी अवशिष्ट का एक विशाल कारोबार ही खड़ा हो गया है और इसमें नयी जान पड़ गयी है। ‘पॉपुलर कल्चर’ के परंपरागत रूपों और मास कल्चर के नमूने की नयी लुम्पेन बाज़ारी संस्कृति में ढल कर फ़ासीवाद के अनेक तत्व इस वक्त सतत क्रियाशील हैं। साधु, संत, मठ, आश्रम, धार्मिक टी.वी. चैनल, हिंदुत्ववादी प्रचारतंत्र, रूढि़वादी सामाजिक और धार्मिक सीरियलों की बढ़ती लोकप्रियता ने जहां एक तरफ़ धर्म और ‘देवत्व’ का एक विशाल बाज़ार पैदा कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ़ नृशंसता का उत्सव मनाती सत्य कथाओं और अपराध कथाओं के ज़रिये मनोरंजन उद्योग फलफूल रहा है, जिसमें शिक्षित मध्यवर्ग सहित आबादी के विशाल तबक़े प्रशिक्षित और अनुकूलित हो रहे हैं। इस विशाल कारोबार में फ़ासीवादी कुव्वतें पूरी तरह संलग्न हैं और इसमें बेशुमार पूंजी लगी हुई है। इस तरह फ़ासीवाद के लिए अनुकूल सांस्कृतिक वातावरण पहले से तैयार है और ये कुव्वतें अपनी हेकड़ी से मीडिया में मौजूद विवेकशील स्वरों को दबाने में सफल हो रही हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार हमले हो रहे हैं। किताबें जलाना, सिनेमा और नाटक का प्रदर्शन रुकवाना, चित्र-प्रदर्शनियों पर हिंसक हमले करना - सांप्रदायिक फ़ासीवाद के उन्मत्त गिरोहों के द्वारा अंजाम दी जानेवाली ऐसी घटनाएं आये दिन घट रही हैं।

मुज़फ्फ़रनगर का हत्याकांड और अल्पसंख्यकों का विस्थापन बताता है कि फ़ासीवादी शक्ति किस तरह से रूढि़-पोषक खाप पंचायतों, हरित क्रांति तथा पुरुष सत्तावाद के आधार पर खड़ी राजनीति और प्रतिक्रियावादी सामाजिक संस्थाओं से तालमेल बिठाकर उन्हें अपने नियंत्रण में लेती है। उन्होंने नियोजित तरीक़े से ‘लव जिहाद’ का दुष्प्रचार करके सांप्रदायिकता को बहू-बेटी की इज्ज़त का मामला बनाया और एक साथ वर्गीय और जेंडर हिंसा का षडयंत्र रचा, जिसमें हम आज़ादी के बाद सम्पन्न हुए भूस्वामी वर्ग और पूंजीपति वर्ग की आपसी सुलह और कारस्तानियों का सबसे भद्दा रूप देख सकते है।

जिस आसानी से और बिना किसी जवाबदेही के भारतीय राज्य, विरोधी आवाज़ों को दबाता जा रहा है, जिस तरह आतंकवाद की झूठी आड़ में निरपराध मुस्लिम नवयुवकों को गिरफ्तार कर लेता है और माओवाद के नाम पर किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता को पकड़ लेता है और यातनाएं देता है, जिस तरह श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ायी जाती हैं, लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों को जिस तरह कुचला जाता है, जिस तरह से बड़े पैमाने पर कश्मीर और उत्तरपूर्व के राज्यों में मानवाधिकार हनन हो रहा है, दलितों और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मामलों में सरकारी तंत्र कोई कार्रवाई करने के बजाय हमलावरों के बचाव में जिस तरह लग जाता है, और कॉरपोरेट मीडिया तंत्र लोगों को इन चीज़ों की ख़बर तक नहीं देता, यह सब न केवल यह दर्शाता है कि हमारे समाज और राजनीति का संकट गंभीर रूप अखि्तयार कर चुका है बल्कि यह भी बताता है कि हमारे इस संवैधानिक-लोकतांत्रिक निज़ाम के अंदर ही इन सब चीज़ों के लिए गुंजाइश बन चुकी है और यह निज़ाम अब इसी दिशा में आगे जाये, इसकी तैयारी भी पूरी है। मौजूदा फ़ासीवादी मुहिम राज्य की इसी निरंकुशता को एक नयी आपराधिक आक्रामकता और स्थायित्व देने के लक्ष्य से संचालित है। इस संदर्भ में आने वाले आम चुनावों में फ़ासीवादी ताक़तों को नाकामयाब करना बेहद ज़रूरी है।

रोज़गारविहीन ‘विकास’ का जो मॉडल राज्य ने लागू किया है, उसने इस चुनौती को और विकराल बना दिया है। विस्थापन और बेदख़ली के ज़रिये संचय का नज़ारा आज का मुख्य नज़ारा है। देश के बेशक़ीमती प्राकृतिक संसाधनों और लाखों-करोडों़ की सार्वजनिक परिसंपत्तियों की बेरहम लूट और बर्बादी एक लंबे समय से जारी है। लोगों से खेत, जंगल, ज़मीन, पंचायती ज़मीनें छीनी जा रहीं हैं और खनन करने, राजमार्ग बनाने से लेकर बैंक, बीमा, जनसंचार, शिक्षा, स्वास्थ्य यहां तक कि डिफेंस जैसे क्षेत्रों को कॉरपोरेट पूंजी और विदेशी निवेशकों के हवाले करने के उपक्रम लगातार चल रहे हैं, जिससे असमानता बेतहाशा बढ़ी है और सामाजिक ध्रुवीकरण चरम बिंदु पर पहुंच रहा है। आबादियों के विशाल हिस्से उजड़ रहे हैं और रोज़ी रोटी के लिए वे मारे-मारे फिर रहे हैं। जिंदगी बसर करने के हालात कठिन से कठिनतर होते जा रहे हैं। अवाम की प्रतिरोध की ख्वाहिश को मुख्यधारा की सियासी पार्टियों का समर्थन लगभग नहीं मिल रहा। कई बार छोटे छोटे ग्रुप विभिन्न मुद्दों पर अपनी सीमित क्षमता के सहारे, कई बार बिना नेतृत्व के भी, लड़ते और कभी कभी थकते नज़र आते हैं। आदिवासियों, ग़रीब किसानों, दलितों, बेसहारा शहरी ग़रीबों, उत्पीडि़त स्त्रियों, अल्पसंख्यकों का विशाल जनसमुदाय मुख्यधारा के राजनीतिक प्रतिष्ठान की हृदयहीनता से हैरान और ख़फ़ा है, और उससे उसका भरोसा उठता जा रहा है। असंगठित, असहाय, हताश आबादियों और बेरोज़गार भीड़ों का गुस्सा अक़्सर आसानी से दक्षिणपंथी और फासिस्ट लामबन्दी के काम आता है। अस्मिता की प्रतिक्रियावादी राजनीति कई बार इसका उपयोग करती है। इसके लिए जहां वर्चस्ववादी अस्मिता की शासक वर्गीय राजनीति से लड़ना ज़रूरी है वहीं यह भी ज़रूरी है कि वंचित तबकों की प्रतिरोधी अस्मिता के सकारात्मक और जनतांत्रिक सारतत्व के प्रति हम ग्रहणशील हों और उसकी रक्षा करें और साथ ही वंचित तबकों की व्यापक जनतांत्रिक एकता के निर्माण की चुनौती को स्वीकार करें। हमें यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यकों में काम करने वाली फिरके़वाराना और दकि़यानूसी ताक़तें भी अन्ततः हिन्दुत्ववादी फासिस्ट मुहिम की खुराक़ और इसके विनाशक दुष्टचक्र को चलाने का औज़ार ही सिद्ध होती हैं। इसलिए साम्प्रदायिक फासीवाद से कारगर ढंग से लड़ने के लिए हर रंगत की साम्प्रदायिक, कट्टरतावादी और रूढि़वादी ताक़तों से एक साथ वैचारिक संघर्ष भी ज़रूरी है। इस वक्त़ जहां सियासी सतह पर वामपंथी और लोकतांत्रिक व सेक्यूलर ताक़तों और संगठनों की ऐतिहासिक जि़म्मेदारी है कि वे बिना वक्त़ गंवाये एकजुट हो कर मुक़ाबले की तैयारी करें, वहीं इसमें कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों, समाजविज्ञानियों, शिक्षकों, पत्रकारों और अन्य पेशेवर लोगों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होगी। राजनीति की अक्षमता का हवाला देकर हम अपनी जि़म्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकते।

लेखक और कलाकार आज के हालात में लेखक-नागरिक और कलाकार-नागरिक ही हो सकते हैं, अपने क़लम और अपनी कला के साथ इस अवामी जंग में शिरकत करते हुए। सभी तरक्क़ीपसंद, जम्हूरियतपसंद और मानवतावादी सांस्कृतिक संगठनों की इस जंग में शिरकत लाजि़म है। हम भूले नहीं हैं कि 1930 के दशक में जब हिंदी-उर्दू इलाक़े के इंक़लाबी नौजवान लेखक और लेखिकाओं की कोशिशों के नतीजे के तौर पर प्रेमचंद की सदारत में प्रोग्रैसिव मूवमेंट की बुनियाद पड़ी तो कुछ ही समय में यह पहल किस तरह एक विराट, बहुमुखी अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन में बदल गयी थी। भारतीय संस्कृति में मध्ययुग के बाद इस पैमाने का परिवर्तन नहीं हुआ था। उस समय, 1930 और 40 के दशक में यह दुनिया विकल्पहीन नहीं लग रही थी। सब एक बेहतर, न्यायपूर्ण समाज का सपना ही नहीं देख रहे थे, उसे पूरा करने की लड़ाई में हिस्सा लेने को तत्पर थे। यही दौर यूरोप और जापान मे फ़ासीवाद के उदय, स्पेनी गृहयुद्ध और दूसरे विश्वयुद्ध का भी था। दुनिया भर में उपनिवेशवाद के खि़लाफ़ चले स्वतंत्रता आंदोलन हों या फ़ासिज्म़ का प्रतिरोध, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने उनमें अग्रगामी भूमिका अदा की। हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्विरोधों के चलते जैसी क्षतिग्रस्त और खून में रंगी आज़ादी हमें मिली, उसके बावजूद हमारे फनकारों और अदीबों ने हिम्मत नहीं हारी और उपमहाद्वीप की जनता के दिल में प्रगतिशील मानव-मूल्यों को परवान चढ़ाने वाली रचनाशीलता की जगह बनायी। सिनेमा, रंगमंच, संगीत, चित्रकला और साहित्य में प्रगतिशील रचनाकारों ने जनमानस को नयी दिशा देने वाले काम किये जिनका असर आज तक हमारी ज़बान और बरताव में दिखायी देता है। उस समय प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू नहीं, उसके आगे चलने वाली मशाल है, या होनी चाहिए। हम इसी परंपरा के वारिस हैं।

आज एक बड़ी और नयी साहसिक पहलक़दमी की ज़रूरत है। फ़ासीवादी ताक़तें जिस पैमाने पर सक्रिय हैं, उसी पैमाने पर उनका जवाब देना होगा। छोटे मोटे वक्तव्य या प्रतीकात्मक कार्रवाइयों की भी अहमियत है, मगर इतने भर से इस जद्दोजहद में कामयाबी हासिल नहीं होगी। स्थिति की विडंबना है कि अभी भी ऐसे बहुत से मोर्चे हैं जिन पर सांप्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तें लंबे समय से उपस्थित और आक्रामकता के साथ सक्रिय हैं, उन पर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक इदारों की सक्रियता नहीं के बराबर है। लेकिन इस कठिन घड़ी में भी फ़ासीवाद का मुकाबला किया जा सकता है, उसे रोका जा सकता है और यहां तक कि उसे शिकस्त दी जा सकती है बशर्ते कि हम इसके लिए एकजुट हो कर खड़े हों। तमाम विषम चुनौतियों के बावजूद अंतत: यह हमारा समय है। इसके लिए ज़रूरी है कि हम साहित्यिक परिदृश्य में व्याप्त अपसंस्कृति से खु़द को आज़ाद करें, आपाधापी, आत्मपूजा, गुटबाज़ी, लालच और तुच्छताओं से ऊपर उठते हुए, संघर्षशील चेतना के साथ आसन्न चुनौती का मिलकर सामना करें। प्रतिरोध की शक्तियों के लिए यह समय गहन पारस्परिक संवाद, सहकार और एकजुटता का समय है। आज ज़रूरी है कि देशभर में (और ख़ासकर उत्तर भारत में) तमाम प्रगतिशील, जनवादी, सेक्युलर और सच्चे उदार मानववादी साहित्यिक सांस्कृतिक संगठन और व्यक्ति, छोटे बड़े मंच और पत्र-पत्रिकाएं, लेखक, नाट्यकर्मी, संगीतकार, चित्रकार, शिल्पी और समाजविज्ञानी एक बृहत्तर संजाल बना कर काम करें, नयी योजनाएं बनायें, वर्कशाप करें, हर फ़ोरम पर वैचारिक-सांस्कृतिक अभियानों को संगठित करें, प्रदर्शनियां तैयार करें, जत्थे निकालें और तमाम सांस्कृतिक कलात्मक व वर्चुअल माध्यमों और रूपों का उपयोग करते हुए साधारण लोगों को बड़े पैमाने पर संबोधित करें। फ़ासीवाद के कुटिल कुत्सित प्रचार-तंत्र का मुक़ाबला यही चीज़ कर सकती है।

हम इस देश की ज़रख़ेज़ सेकुलर सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत और नवजागरण की संपन्न मानवतावादी जनतांत्रिक और प्रगतिशील साहित्यिक परंपराओं के सच्चे वारिस हैं। ये विरासत कहीं गयी नहीं है। बस विस्मृति की धूल में दबी हुई है। प्रतिरोध का निश्चय करते ही वह हमारे लिए फिर से जी उठेगी और उसके अर्थ चमकने लगेंगे। स्वतंत्रता, समानता और जनवाद के लिए संघर्ष और कुरबानियों की अपनी महान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रगतिशील विरासत की शान के मुताबिक इस कठिन समय में भी यक़ीनन व्यापक जनतांत्रिक शक्तियों के साथ एकजुटता से इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। हमें यक़ीन है कि अपनी प्रतिबद्धता, लगन, रचनात्मक कल्पना और आविष्कारशील प्रतिभा की मदद से हम अपनी इस भूमिका का कारगर ढंग से निर्वाह कर सकेंगे।


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Oct 19, 2013

आखिर क्यों जरुरी है? आत्मकथ्य लिखना एक शिक्षक के लिए!

शैक्षिक विशेषज्ञों के अनुभवों से परे बतौर शिक्षक या शैक्षिक तंत्र में काम करने वाले व्यक्ति के अनुभवों और प्रयासों का दस्तावेजीकृत रूप सामान्यतः बहुत कम ही सामने आता है। हिन्दी में तो यह लगभग न के ही बराबर है। यह लेख ऐसे शिक्षकीय प्रयासों को प्रेरित करने की कोशिश भर है और कुछ ऐसे प्रयासों को सामने रखती है जिससे अध्यापन कर्म में संलग्न शिक्षक अपने अनुभवों को, स्व-प्रयासों से अपने दैनिक कार्यों को आत्मकथ्य अथवा डायरी / पुस्तक रूप में प्रस्तुत कर सकें?


हम सब जानते हैं कि ऐसे शिक्षकों की कमी नहीं है जो अपने विषयों के अच्छे ज्ञाता होते हैं और कक्षाओं में मन लगाकर बहुत अच्छा पढ़ाते भी हैं। शिक्षण काल में इस सन्दर्भ में बहुत बार सुख-दुख भी पाते हैं। शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों के संपर्क में उन्हें कई प्रकार के खट्टे-मीठे अनुभव भी होते हैं। लेकिन अनुभवों का स्वरूप ठीक से पहचानने वाले, उनकी उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता को समझकर दूसरों तक पहुंचाने का काम करने वाले शिक्षक बिरले ही होते हैं और दूसरों के अनुभव और ज्ञान से प्रेरणा प्राप्त कर अपने कार्य की गुणवत्ता बढ़ाने में रुचि रखने वाले शिक्षक भी बिरले ही होते हैं। लिखने वाले भी बिरले और लिखे हुए का अध्ययन कर अपना पुनर्प्रशिक्षण करने वाले भी बिरले। ऐसे लोग बहुत हैं जो एक बार कोई प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा करके अपने-आपको सर्वांग शिक्षित-प्रशिक्षित मान लेने का भ्रम पाल बैठते हैं। ऐसा भ्रम हम न पालें। हम कोशिश करें कि अपनी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए बार-बार श्रेष्ठ शिक्षा साहित्य पर ध्यान देने वाले शिक्षकों की संख्या बढ़े। जाहिर है ऐसे शिक्षकीय प्रयासों का दस्तावेजी रूप में हम सबके सामने आना बहुत जरुरी है।

हमें यह भी कोशिश करनी चाहिए कि हमारे शिक्षक ऐसे साहित्य की खोज और उपलब्धि में रुचि लें जो नए ज्ञान से भरा हो, प्रेरक हो और रोचक भी हो। जो शिक्षक अपने अध्ययन और अनुभव में रुचि लते हैं वे शिक्षा-साहित्य रचते हैं। नया ज्ञान और नए विचार देते हैं। जो अपने अनुभवों के संप्रेषण में रुचि लेते हैं वे या तो डायरी लिखते हैं या आत्मकथा लिखते हैं या इन अनुभवों के समूह को नए शिक्षा सिद्धांतों का आधार देकर एक अच्छा वैचारिक ग्रंथ लिख देते हैं। कुछ ऐसे भी शिक्षक होते हैं जो अपने अध्यापकीय अनुभवों को कथात्मक रूप दे देते हैं। वे कथा की रचना करने में निपुण होते हैं। ऐसे शिक्षकों को इन अनुभवों को हम सबके और शिक्षा व्यवस्था के भले के लिए अपने इन अनुभवों को सामने लाना चाहिए।

माकारेंको की ‘रोड टु लाइफ’ और गिजुभाई का ‘दिवास्वप्न’ उनके अध्यापकीय जीवन के अनुभवों का कथात्मक निचोड़ है। गिजुभाई ने ‘दिवास्वप्न’ लिखी। तेत्सुको कुरोयानागी ने जापानी भाषा में ‘तोत्तोचान’ लिखी। जॉन डिवी, पेस्तोलॉजी, रूसो के अनुभव भी आपने शिक्षक-प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की पुस्तकों में कुछ-कुछ पढ़े होंगे। जॉन होल्ट, टैगोर, अरविंद और गांधीजी को भी पढ़ा होगा। ये सब महान शिक्षक थे। जो शिक्षक शिक्षण की प्रक्रिया पर गहराई से सोचता है और अनुसंधान, डायरी, उपन्यास, आत्मकथा या किसी भी विधा द्वारा वैचारिक या कथात्मक प्रस्तुति द्वारा अपने अनुभव और विचार अन्यों तक पहुंचाता है वह हम पर बहुत बड़ा उपकार करता है। हम शिक्षक के रूप में लाभान्वित होते हैं और अभिभावक तथा शिक्षार्थी के रूप में भी लाभान्वित होते हैं। हर अच्छा और सच्चा शिक्षक अपने शिक्षण कार्य के उन्नयन के उपायों पर विचार करता है, स्वाध्याय करता है और सपने देखता है। लेकिन हम कई बार देख चुके हैं कि यह व्यवस्था उसकी इस मौलिक सूझ-बूझ की कोई कद्र नहीं करती, बल्कि आदेश देती हैं कि वह उसी ढर्रे पर चले जिस पर पहले सभी चलते आए हैं। उसे सपना देखने ही नहीं देते जो कि इस दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया का अहम् अंग है अपने सपने को पल्लवित करना और सपने को पूरा करने का प्रयास और ऐसे प्रयासों को अनुभव रूप में लिखने की कोशिश करना।

गिजुभाई ने सपना देखा कि वे ढर्रे पर नहीं चलेंगे। शिक्षाधिकारी ने भी पहले तो शंका की किन्तु जब पूरी छूट दी और साल भर बाद अपनी आंखों से परिणाम देखा तो गदगद हो गए। अध्यापक की मौलिक सूझ-बूझ तथा प्रयोग और नव-चिन्तन में कई तरह के प्रयोग, अनुप्रयोग और अंतर्दिशा ही शैक्षिक विकास की नई दिशा और नई ऊंचाइयां जरूर पहुँचा सकेंगे। सपने देखने के लिए भी सहारा चाहिए। नया ज्ञान पाने का अवसर हो, नए प्रयोगों की छूट हो, नई-पुरानी श्रेष्ठ पुस्तकें, पत्रिकाएं तथा अनुसंधान प्रतिवेदन, शिक्षकों के अनुभव पढ़ने की रुचि हो तो शिक्षक की सक्रियता निश्चित ही एक नया रूप लेती है। गिजुभाई को मोंटेसरी तथा गांधी जी जैसे आदर्श प्रेरणा स्रोत मिले और भी जो जो अच्छा गुरु और अच्छा साहित्य उन्हें मिला उससे वे गुण ग्रहण करते गए।
जिन्होंने भी शिक्षकों के प्रशिक्षण की कल्पना की थी उनकी मंशा यही थी कि शिक्षक को गुण मिलें, ज्ञान मिले। अध्ययन, अभ्यास और प्रयोग का पृष्ठबल मिले। प्रशिक्षक की एक अलग पाठ्यचर्या बनी, अलग पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों का निर्माण हुआ और सेवाकाल में ही सरकारी व्यय पर सरकारी संस्थाओं में सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण का प्रबंध हुआ। इन संस्थाओं से शिक्षकों को नई-नई खोजों, नई-नई विधियों और नई-नई पुस्तकों-पत्रिकाओं का संदेश लेकर अपने विद्यालय लौटे और सहयोगी शिक्षकों में उस ज्ञान को बांटा। कालांतर में निहित स्वार्थवश यह प्रणाली दूषित हो गई। अतः आवश्यकता है कि सीधे कक्षा शिक्षण में जुड़े हमारे शिक्षकों के दिन-प्रतिदिन के शैक्षिक अनुभवों को नीति निर्धारकों तक और अन्य नियामक संस्थाओं तक पहुंचाया जाए। ऐसी स्थिति में सभी शिक्षकों को अपने अनुभवों को दस्तावेजीकृत करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इस संबंध में दो पुस्तकें हमारे शिक्षण कार्य में नई दृष्टि और नए अनुभव देने वाली है इन्हें जब पढ़ते हैं तो ऐसे लगता है कि जैसे नई जान आ गई हो। गिजुभाई की पुस्तक ‘दिवास्वप्न’ तेत्सुको कुरोयानागी की पुस्तक ‘तोत्तोचान’। ये दोनों पुस्तकें हैं तो दोनों लेखकों के जीवन के शैक्षिक अनुभव ही किन्तु अधिकाँश रूप इनका कथात्मक है। लगता है जैसे उपन्यास हैं। दोनों पुस्तकें इतनी रोचक / इतनी विचारपूर्ण और इतनी प्रेरणाप्रद हैं कि जो पढ़ेगा उसमें नई जान आ जाएगी, नए प्राणों का संचार हो जाएगा।
इन शैक्षिक अनुभवों को जानना जितना आल्हादकारी है उतना ही लाभकारी भी है। यह हमारा दर्पण है। इसमें जो नजर आ रहा है वह हमारे ही काम का बिंब है। यह काम हम रोज करते हैं। अब हम देखें कि उन्हीं कामों को करते इन्हें क्या अनुभव हुए। काम वे ही हैं जो हम भी करते हैं लेकिन अनुभव भिन्न हैं। यह भिन्नता है अनुभवों के प्रकार की। ये अनुभव इतनी गहराई और बारीकी से देखने को किसी और आत्मकथा में नहीं मिलेंगे। एक नजरिये से देखिए तो शिक्षण कार्य को निपुणता से करने की उनकी चेष्टा और दूसरे नजरिये से देखिए तो किस दृष्टि से उन्होंने क्या-क्या काम किए हैं? शिक्षा सिद्धांतों के गहरे अध्ययन तथा समसामयिक शैक्षिक विचार सारणियों के प्रति सजगता बिना कोई अधुनातन शैक्षिक दृष्टि बन नहीं सकती। तो हमें जरुरत है इसी चेष्टा और ऐसी दृष्टि की ही।

कक्षा शिक्षण के अनुभवों के कारण इनको हर शिक्षक की क्षमता, योग्यता, अनुभव और कल्पनाशक्ति से शिक्षण विधि या उसकी शैक्षिक दृष्टि का भी पता चल जाता है। ऐसे शिक्षकों की बारीक से बारीक गतिविधि यदि इसी बहाने दस्तावेजी रूप में अंकित हो जाएतो क्या कहने? आप मानेंगे कि कक्षा शिक्षण में रूचि ले रहे शिक्षक के नजरिये से ऐसे आत्मकथ्य की हर बात मौलिक होगी क्योंकि हर अनुभव निश्छल, निष्कपट, नितांत निजी अनुभव होगा। यह लेखक की आत्मकथा से आगे बढ़कर एक विशेष कालखण्ड का शैक्षिक इतिहास भी होगा। शिक्षक ही नहीं, शिक्षा प्रशासक, शिक्षक-प्रशिक्षक, अभिभावक और प्रशिक्षणार्थी जो भी इसे पढ़ेगा, नई दृष्टि और नई प्रेरणा पाएगा।

उपरोक्त आलेख 'प्रारम्भ ~ शैक्षिक संवाद : शैक्षिक विचार एवं संवाद की पत्रिका  में प्रकशित'





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