अभी फुर्सत का समय नहीं है......मीलों चलना है आगे !

  बड़े तामझाम के साथ शुरू किया गया पहली अप्रैल 2010 से देश में नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 लागू हो चुका है। इस महत्वाकांक्षी कानून की मंशा छह से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को शिक्षा का हक दिलाना है। सरकार की मंशा के बावजूद इस कानून को यथार्थ के धरातल पर उतारना आसान साबित नहीं हो रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा शिक्षा के अधिकार (RTE) को लागू किए एक वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। अपनी स्थानिक जरूरतों और परिस्थितियों के हिसाब से कुछ नियम बनाने और उन्हें लागू करने के लिए राज्य-सरकारों को मिली एक वर्ष की मियाद भी अब समाप्त हो चुकी है। इस कानून के सही-गलत से बढ़कर अब बहस वर्तमान समय में पूरी तरह इसके कार्यान्वित करने के पहलुओं और बिंदुओं पर केन्द्रित हो गई है। सभी बच्चों का नामांकन, उनकी स्कूल की पहुंच और उनमें मूलभूत सुविधाएं, शिक्षक-शिक्षार्थी अनुपात आदि मौजूदा बहस के अंतर्गत हैं।


कानून के पारित होने से पहले इस कानून के माध्यम से भारत के प्राथमिक शिक्षा के परिदृश्य में बुनियादी परिवर्तनों की लंबी लिस्ट को अक्सर गिनाने वाले लोग अब लगभग पूर्णतयः खामोश खामोश हो चले हैं। पिछले एक वर्ष में राज्यों में नियम बनाने की कोताही भरी हलचल रही है और इस बीच कुछ नियमों - विनियमों को लागू करने के आदेश भी जारी हुए। इसके बावजूद कई राज्य सरकारों के पास इसे लागू करने की कोई स्पष्ट योजना नजर नहीं आती। अब तक हुए अनुभव कम से कम यह बताते हैं कि इस कानून को लेकर सभी राज्य सरकारों की कितनी प्रतिबद्धता है, इस कानून को लेकर उससे जुड़े लोगों की जागरूकता का स्तर क्या है और निजी / पब्लिक स्कूलों द्वारा इसके प्रावधानों का किस तरह खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया जा रहा है या वे किसी भी तरह से बच निकलने के चोर दरवाजे खोज रहे हैं।


यदि निजी / पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी के लिए स्वतंत्र हैं और सरकारें इन पर किसी भी तरह का नीति - नियंत्रण स्थापित नहीं कर सकती तो शिक्षा के अधिकार (RTE )कानून का उन बच्चों और उनके माता-पिताओं के लिए क्या अर्थ बनता है जो इन निजी / पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं ? शिक्षा का अधिकार स्पष्ट तौर पर उल्लेख करता है कि किसी भी स्कूल में बच्चों या उनके माँ-बाप की प्रवेश परीक्षा नहीं ली जाएगी, किसी भी तरह की डोनेशन नहीं ली जाएगी; इसके बावजूद इन स्कूलों ने इन सारे अंकुश भरे नियमों को ताक पर रखकर इनसे बचने के रास्ते निकाल लिए हैं या यह खोज अब भी जारी है। इस कानून के आने के बाद ये सारी चीजें / कवायदें पहले की तरह खुल्लम-खुल्ला रूप में तो नहीं हो रही हैं लेकिन असलियत में तो तो यह मनमानी ही कर रहे हैं। यदि कोई माता-पिता / संगठन इसके विरोध में स्कूल में आवाज उठाता है तो उनके पास हजारों बहाने होते हैं, उन्हें स्कूल से बाहर का रास्ता दिखाने के। हमारे सिस्टम की बिडंवना ये है कि ये स्कूल न तो बच्चों के माता-पिताओं के प्रति अपनी जवाबदेही महसूस करते हैं और न ही कानून के अनुपालन के प्रति प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं। 


इस कानून की निगरानी करने वाले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी सरकारों के इस रवैये पर निराशा जाहिर की है। सामाजिक नागरिक संगठनों के मंच आरटीई फोरम की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी, केंद्र-राज्य सहयोग का अभाव, स्कूलों और अध्यापकों की कमी ऐसे कारण हैं जिसके चलते शिक्षा का अधिकार कानून का फायदा जरूरतमंद बच्चों को नहीं मिल पा रहा है। फोरम के मुताबिक आरटीई के लागू होने के एक साल बाद भी इस कानून के मुख्य प्रावधानों को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है जो काफी निराशाजनक है। इस कानून में स्पष्ट रूप से 25 प्रतिशत वंचित / कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी / पब्लिक स्कूल में मुफ्त शिक्षा पाने का अधिकार दिया गया है लेकिन हमारी नजर में अभी तक एक भी ऐसा स्कूल नहीं आया है जिसने इस नियम का पालन करने में कोई पहल की हो। 


एक वर्ष से ज्यादा का समय बीतने के बाद भी सरकारों के पास अभी तक इस बात के कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं कि किस निजी / पब्लिक स्कूल में कितने बच्चे पढते हैं और उनमे वंचित/ कमजोर वर्ग के बच्चों की निश्चित संख्या क्या होगी। भले ही इस कानून के तुरंत कार्यान्वित करने के आदेश केन्द्रीय और राज्य सरकारों ने जारी कर दिए हों लेकिन अभी भी सभी सरकारों के पास इसे पूरी और सही तरह से लागू करने का कोई स्पष्ट नक्शा नहीं है। शिक्षकों की भारी कमी के चलते सवाल तो पहले से ही खड़े हो रहे हैं ऊपर से इस कानून के प्रावधानों को पूरा करने के लिए आधारभूत ढांचा तक नहीं है। 


कानून की निगरानी का दायित्व संभाल रहे राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग को इसकी पहली समीक्षा तीन साल बाद करनी है, लेकिन उसे पहले एक साल के अपने आकलन में निराशाजनक तस्वीर हाथ लगी है, हालांकि उसे जल्द ही हालात सुधरने की उम्मीद है। एक वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी पूरे देश में करीब 10 लाख शिक्षकों की जगहें खाली हैं, अकेले उत्तर-प्रदेश में ही करीब एक लाख से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं लेकिन अभी इस दिशा में सरकार किसी तरह की कार्यवाही करती नहीं दिखतीं। उत्तर-प्रद्देश में शिक्षकों के भर्ती नियमों में रोज रोज संशोधनो के जरिये सरकार ने पूरी चयन प्रक्रियायों को ही न्यायालयों के घेरे में ला दिया है। इस कानून के आने के बाद यह जरूर हुआ है कि इस कानून के प्रावधानों की शर्तों / प्रावधानों को पूरा करने के नाम पर सभी सरकारें इन्हें जैसे-तैसे / उलटा-सीधा पूरा कर देना चाहती हैं। मनमाने  ढंग से दूरस्थ कोर्स शिक्षक शिक्षा में प्रस्तावित किए जा रहे हैं जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन/ संचालन देखकर जिन्हें पूरी तरह से खानापूर्ति के अलावा कुछ और नहीं कहा जा सकता। 


मूल सवाल शिक्षा की गुणवत्ता का है। सभी बच्चों को शिक्षा देने जितना ही जरूरी यह भी है कि सभी बच्चों को स्तरीय शिक्षा दी जाए। शुरू में एक राय यह थी कि हर स्कूल की हर कक्षा में न्यूनतम इन्फ्रास्ट्रक्चर क्या हो, यह तय करके इसे लागू किया जाए, तो काफी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। यह आकलन भी जरूरी है कि बच्चे सचमुच कितना सीख पा रहे हैं। सिर्फ सबको शिक्षा देने की औपचारिकता पूरी करने वाले नजरिये से वह मकसद कभी हासिल नहीं हो सकता, जिसके लिए शिक्षा का अधिकार कानून बनाया गया। सरकार चाहे सभी तक शिक्षा पहुंचाने के कितने ही दावे करे लेकिन इस कानून के क्रियान्वयन और पालन में जिस तरह की अनमनी चाल वह चल रही है, उससे उसके प्रति संकल्प और प्रतिबद्धता का पता तो चलता ही है। आरटीई कानून लागू होने के एक साल बाद भी एक चौथाई बच्चे स्कूल से बाहर हैं। इस कानून के आने से पहले इसे लागू करवाने वालों के लिए फुर्सत का समय अभी नहीं आया है, ........ अभी मीलों चलना है आगे!

8 comments

बच्चों की शिक्षा कि गुणवत्ता ही देश का भविष्य भी तय करती है | सरकार के साथ ही पब्लिक स्कूल भी अपनी जिम्मेदारी समझें यह ज़रूरी | बहुत दुखद है कि हमारे देश में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बातें भी राजनीतिक दावपेचों का शिकार हो फाइलों में ही उलझ जाती हैं......

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भाई ,आज मुख्य सवाल शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर उठ रहा है.हमें तो सरकार के असल उद्देश्य ही नहीं समझ में आ रहे हैं.करोड़ों रूपये के बजट को ठिकाने लगाने के नाम पर केवल कागजों में शिक्षा दी जा रही है.

सबसे बुरा हाल तो राज्य-संचालित विद्यालयों का है,जहाँ यदि बच्चे हैं तो पर्याप्त कमरे और शिक्षक नहीं हैं और जहाँ यह सब है वहाँ बच्चे नहीं हैं!

बाल अधिकार,शिक्षा का अधिकार सब कागजों में मिला हुआ है. पब्लिक स्कूल के प्रबंधन में कोई दखल नहीं है.वहाँ शिक्षा का वातावरण है जबकि सरकारी विद्यालयों के प्रति उदासीनता है इसलिए कि वहाँ गरीब छात्र पढते हैं !

अब इस शिक्षा जैसे मसले पर किसे चिंता है ?

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आपके अवलोकनों से सहमत,

प्रश्न बड़े गहरे हैं,
पर संवाद पर पहरे हैं।

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अधिनियम, कानून और प्रशासन ये सब राजनीतिक चोचले हें. अधिनियम बनाने में सरकार बहुत चुस्त होती है क्योकि कल उन्हें अपनी उपलब्धियों की सूची में शामिल करके अपनी पीठ ठोकने का एक कारण सामने होता है. ये अधिनियम सिर्फ और सिर्फ कागजों पर लागू होते हें. उनके सहारे खाने वालों के लिए रास्ते खुल जाते हें.
मेरे घर के सामने एक दुकाननुमा शटर से बंद कमरा है, जिसको किसने किराये पर लिया नहीं मालूम - सुबह दस बजे बाहर के कच्चे चबूतरे पर मोहल्ले के आवारा घूमने वाले गरीब बच्चों को इकठ्ठा करके बिठा लिया जाता है. कहीं से बाल्टी में कुछ बन कर आ जाता है. उस दुकान में बोरों में भरे अनाज ही समझ आता था. बच्चों को दोनों में या फिर उनके लाये बर्तन में कुछ खाने के लिए दिया जाता और १२ बजे दुकान बंद. दो टीचर नुमा महिलाएं. उनको हिंदी नहीं बल्कि ए बी सी डी जोर जोर से चिल्ला चिल्ला कर पढ़ाती नजर आती बस २०-२५ मिनट तक और फिर दुकान का काम ख़त्म. बताएं ये कौन सी योजना के अंतर्गत आता है.
शिक्षा का यह रूप अधिनियम के उद्देश्य को पूरा कर रहा है शेष सुविधाएँ कहीं और जा रही हें.

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सही कहा...अभी मीलों चलना है आगे।
बढ़िया अवलोकन।

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@ummaten commented on your post "फिफ्टी परसेंट चांस है कि मीलों चलना पड़े और फिफ्टी परसेंट ये भी कि रास्ता अंतहीन बना रहे !"

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सरकारी स्कूलों की हालत देख कर तो नहीं लगता कि गुणव्त्ता आएगी॥

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Very Nice Article....Hard to believe we are living in the world where once Nalanda and Takshashila like university was present.
Paritosh
www.dr3vedi.blogspot.in

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